लगातार टालते रहने से अक्सर निर्णय बदल जाते है। अप्रत्याशित बदले हुए निर्णयों को स्वीकारना बेहद दुष्कर होता है।अपनी मानसिकता को दोनों परिस्थितियों के लिए तैयार रखे जो परिणाम आप देखना चाहते है और जो नहीं देखना चाहते है फिर किसी के भी जीवन में कुछ अप्रत्याशित घटित ही नहीं होगा । हम सबके भीतर एक भीड़ छिपी होती है जो हमें कुरेदती है,पथविमुख करने को उतावली रहतीहै,अक्सर लोग निर्णायक की भूमिका निभाना चाहते है किन्तु परिणामों के लिए उनके पास कोई विकल्प नहीं---शोभाजैन Protected by Copyscape

बुधवार, 9 दिसंबर 2015

1-  वर्तमान परिपेक्ष्य में..................
 कैसे मनाएं आज हम होली ?
न जीवन मैं खुशियाँ, न घर मैं रंगोली 
सहमी हैं माँ ,ओर बहन भोली 
कैसे मनाएं आज हम होली ?

न प्रेम का गुलाल अब ,न मस्तक पर रोली 
पानी मैं सिर्फ अपनी वेदनाएँ घोली 
कैसे मनाएं आज हम होली ?

खो गयी हॅसी हर घर वीरान हैं 
ज़ख्म और तनाव का हर जगह निशान हैं 
भाई कि रही कहाँ बहन मुँह बोली 
कैसे मनाएं आज हम होली? 

मेरी ख्वाहिश हैं होली के कुछ रंग चुराने कि 
गैरो को नहीं अपनों को आज़माने कि 

पर हर ख़ुशी कि यहां देनी पड़ती हैं एक कीमत 
रिश्तो कि हर रोज़ यहाँ लगती हैं बोली 
कैसे मनाएं आज हम होली ?
कल होली का त्योहार है। हार्दिक शुभकामनाएं।

written by: शोभा  १६ मार्च २०१४


वे एक आदर्श राष्ट्र नहीं बना पा रहे हैं,
और मैं एक आदर्श कविता।।।।।।
हर स्वप्न के लिए नींद चाहिए 
और हर नींद के लिए थकान.............
मेरी दृष्टि में समाज एक बड़ी वैचारिक संस्था हैं।
समाज भाषा में जीता हैं और साहित्य में संस्कारित होता हैं
सबसे आसान हैं भावनात्मक होना किसी भी गलत काम को करने या ढाकने का सबसे सरल जरिया भावनाए हैं अक्सर भावनाओं का दुरूपयोग ही होता आया हैं जब जब वो हावी हुई हैं समझ दरकिनार हो गयी भावनाओं से भी कही ऊपर एक सबसे अहम् बात हैं वो हैं 'अनुभव' और अच्छे और बुरे अनुभवों का लाभ उठा कर उनसे प्रेरित होकर उठाये गए हर कदम जीवन को बहुत वजनदार और बेहद सफल और आत्मविश्वासी बना सकते हैं दुनियाँ का कोई भी रिश्ता सिर्फ भावनाओं पर नहीं चल सकता भावनात्मकता के साथ सबसे अहम समझदारी का होना आवशयक हैं हर उम्र में अलग -अलग भावना और अनुभव होते हैं हर परिस्थिति में भावनायें स्वतः ही विधमान होती हैं हमारी उम्र, अनुभव और भावनाओं के साथ साथ अगर समझदारी में भी पर्याप्त इजाफ़ा हो जाय तो दुनियाँ के किसी भी रिश्ते को निभाना और निभाने के योग्य बन पाना आसान होगा.. भावनायें हमारे लिए महत्वपूर्ण जरूर हैं पर यथार्थ से परे नहीं हो सकती न ही उनसे ऊपर इसलिए भावनाए भी तब तक पुरती हैं जब वो पूर्णतः वास्तविकता और समझ के साथ अभिव्यक्त की जाय 'अति भावुकता' सदैव नुकसान दायक ही रहती हैं किसी भी पहलु की वास्तविकता और समझदारी से लिया गया निर्णय कभी किसी भी प्रकार की क्षति नहीं पंहुचा सकता जो रिश्ता फलों के सामान कठोरता की उपरी परत से बना होता हैं निश्चित ही उसके भीतर भावना की नर्माहट और मिठास स्वतः ही मौजूद होती हैं लकिन जिस रिश्ते में ऊपर से जरुरत से ज्यादा भावनाए और अभिव्यक्ति की नर्माहट होगी वो जीवन की एक छोटे से कठोर झरोखे से ही टूट जायेगा इसलिए रिश्तो की परत यथार्थता के साथ अनुभवों की गहरी समझ की कठोर परत से बनायीं जाय जिसके भीतर गहरी भावनायें छिपी हो ...एक फिलॉसफर ने लिखा हैं ----१-पहले जो जरुरी हैं वो करे, 2-फिर जो आवशयक हैं वो करे, ३-उसके बाद आप वो कर जायेगे जो असंभव सा लगता हैं लेकिन भावनाओ को सर्वोपरि मानने वाला तीसरे नम्बर से अक्सर शुरुआत करता हैं जस्बाती होकर सिर्फ सेलाब ही उठाये जा सकते हैं अपनी समझ को हमेशा सबसे उपर रखे जीवन की हर परिस्थिति में...अक्सर भावनात्मक होकर बनाये रिश्तों से कही जयादा बेहतरीन जीवन वो रिश्ते जीते हैं जो आपसी समझ-[mutual understanding ], समान वैचारिक द्रष्टिकोण, सोचने का तरीका, और अनुशासित जीवन शैली से जिए जाते हैं उसके बाद उनमे भावनाये अपनी पैठ स्वतः ही बना लेती हैं जहाँ ये तीन चीजे हैं वहां शायद कोई रिश्ता न भी हो तो भी उस रिश्ते में बहुत बेहतर जीवन जिया जा सकता हैं ..
हम जो और जैसा सोचते हैं जिसके भी विषय में वास्तु या व्यक्ति हमारी सोच उसी दिशा में गतिशील प्रतीत होती हैं कभी कभी हमारी सोच उस बात के प्रति आस्था का रूप भी धारण कर लेती हैं फिर तथ्यों की वास्तविकता और महत्व फीके पढ़ जाते हैं सत्य तो ये हैं की किसी व्यक्ति के लिए अगर आपको सोच बेहद नकारात्मक बानी हुई हैं और इत्तफाक से उससे जुड़ा कोई काम आपको हानि पहुँचाता हैं या फिर मानसिक क्षति तो आपका पूरा ध्यान उसी पर जायेगा की शायद उसी ने किया होगा या यही हुआ होगा आपकी उसके प्रति सोच वास्तविकता का रूप लेने लगती हैं. आधुनिकीकरण के इस दौर में वर्तमान समय तथ्य – आधारित है परंतु यह भी सत्य है कि आस्था और तथ्य दो अलग – अलग बातें हैं. विज्ञान की भाषा में प्रकृति का आधार ऊर्जा है तो आस्था का आधार भाव है. भारतीय चिंतन के अनुसार व्यक्ति जिस भाव से भगवान के प्रति अपनी आस्था प्रकट करता है, उसी अनुरूप उसे भगवान का सान्निध्य मिलता है। सोच हमारे क्रियान्वयन को गति देती हैं अच्छी सोच उसे सकारात्मक बना देती हैं फिर तथ्य भी आपको अपने पक्ष में ही प्रतीत होते क्योकि आप उसके प्रति पॉजिटिव ऊर्जा लिए हो कहने का तात्पर्य हमारे कार्यों पर हमारी सोच अक्सर हावी रहती हैं इसलिए सोच में गहरा चिंतन होना अत्यंत आवश्यक हैं परिस्थितियां अच्छी या बुरी नहीं होती हमारा नजरियां उन्हें अच्छा या बुरा प्रतीत करता हैं जो हमारे पक्ष में नहीं वो बुरा जो पक्ष में वो अच्छा। जबकि उससे ऊपर भी कुछ हैं उस गणित को समझ लिया तो आप स्वयं को हर परिस्थिति के लिए तैयार पाएंगे। अपनी सोच में चिंतन प्रवृत्ति लाये जैसा आप चाहते हैं हमेशा वैसा नहीं हो सकता इसलिए कभी- कभी उस पहलु की कल्पना भी करे जो आप नहीं देखना चाहते। लेकिन अगर हो जाय तो पूरी तैयारी से आप उसका स्वागत करें क्योकि जब अच्छा हमेशा के लिए नहीं रहता तो बुरा भी स्थाई नहीं फिर उस कुछ समय के मेहमान के लिए पूरा जीवन क्यों निराशा और दुखी बना देना जबकि समय- समय पर होने वाले परिवर्तन ही आपके संतुलन का परीक्षण करता हैं जिनमे आपकी समझ और परिपक्वता का परीक्षण होता हैं इसलिए अपनी सोच को सकारात्मक आस्था का पर्याय बनाकर उस बात के लिए भी चिंतन रखे जिसे आप कभी नहीं देखना चाहते या जो आपके पक्ष की नहीं अक्सर हम उन्ही बातों के विषय में सोचते हैं जो हम चाहते हैं अगर आप दोनों ही चीजों के लिए तैयार हैं तो फिर जीवन में अच्छे और बुरे समय के प्रकोप, अकस्मात घटना से कभी विचलित या भ्रमित नहीं होंगे क्योकि आप पहले ही उसका चिंतन कर चुके थे।एक और बात अपना आत्मविश्लेषण समय समय पर करते रहना चाहिए स्वयं के साथ बातें करें अपने आप से भागे नहीं एक्सेप्ट करना सीखे। अपने द्वारा लिए गए निर्णयों में सही और गलत को खोजे और सुधारे और हर परिणाम के लिए पहले से तैयार रहे अपनी ऊर्जा का सदुपयोग होना बेहद जरुरी हैं बस यही सुनियोजित जीवन शैली और समझदारी भरा जीवन जीने का एक मार्ग हैं जिस पर चलना बहुत कठिन नहीं हैं बेहद सरल हैं उतना ही जितना अच्छे समय को आसानी से जीना।
मेरा खर्च चल रहा है............

हर  रोज घर से निकलता हैं वो
    तीस दिन काम करके लाता हैं
       महीने की पहली तारीख
       जिसका पूरा परिवार करता हैं
 उम्मीदों से भरा इंतजार 
पर  हर रोज इस नौकरी पर
 जाने और घर आ जाने में,
मैं नहीं सीख पाया
 जीवन जीने की कला।
एक दिन एक अनुभव सीखा गया
जीवन की कला
 उस 'अनुभव' ने बताई
जीवन जीने की कला
मैंने पूछा
"आपने सीख लिया?"
उन्होंने कहा
"बिलकुल और अब इसी से

मेरा खर्च चल रहा है............

रविवार, 16 अगस्त 2015

   फेस बुक पर लोकव्यवहार...........


ये विषय फेस बुक पर हमारे व्यवहार और वास्तविक जीवन में हम इन विषयों पर कैसी प्रतिक्रिया करते हैं दोनों के बीच के अंतर को समझते हुए लिखा गया हैं.। ठीक वेसे ही जेसे फेस बुक पर कोई स्टेटस अपडेट करना और उसे फॉलो करना दोनों में बहुत फ़र्क होता हैं क्या जो हम लिखते हैं उसे मानते भी हैं अपनाते भी हैं या सिर्फ़ मित्रो के समक्ष अपनी बुद्धिमानी का प्रदर्शन कर likes बटोरने का प्रयास करते… कभी -कभी ये वास्तविक नहीं प्रवचन जेसा प्रतीत होने लगता हैं… साथ ही ये भी जानने और समझने योग्य बात हैं की चर्चा, परिचर्चा जिस अभिव्यक्ति के साथ हम फेस बुक पर करते हैं जिन आदरणीय शब्दों का प्रयोग ओपचारिक रूप से हम दूसरो के साथ हम फेसबुक पर करते हैं कुछ विशेष मुद्दो या खास विषय, पर क्या वास्तविक जीवन में भी उतने धैर्य, बुद्धिमानी और व्यवहारिकता से बातचीत कर पाते हैं ? सोशल नेटवर्किंग साइड वर्तमान समय में विचार विमर्श की प्रक्रिया को नवीनता देने के साथ -साथ हर व्यक्ति की अपनी उपयोगिता और महत्व को भी प्रदर्शित कर रही हैं.। जैसे कुछ लोग हर मिनट की जानकारी फेसबुक पर अपडेट करते हैं कुछ लोग दिनों की और कुछ महीनों की। कुछ लोगों के लिए ये सिर्फ मनोरंजन का साधन हैं,कुछ लोगो के लिए ज्यादा से ज्यादा नए -नए लोगो को जानने और उनसे मित्रता करने का उत्साह और खुशी ...                        मतलब 2500 से 3000 तक फ्रेंड लिस्ट होना उनके लिए बेहद गर्व की बात हैं। कुछ के लिए ये सामाजिक रूप से चिर -परिचित या मित्रों के साथ न सिर्फ सूचनाओं का आदान- प्रदान बल्कि अपने सुखद और दुखद अनुभवों को बाँटने का भी एक माध्यम हैं। और कुछ के लिए लोक विमर्श के क्षेत्र में अहम भूमिका निभाने का माध्यम भी जिससे किसी भी स्तर के सामाजिक बदलाव की अपेक्षा भी की जा सकती हैं क्योकि कई बार सामाजिक परेशानियों पर अलग- अलग राय और सलाह और कभी-कभी सहयोग भी मिल जाते हैं। वे लोग जिन्हे हम सिर्फ अपने काम तक ही जानते हैं उनके जीवन के दूसरे पहलू और नए व्यक्तित्व की झलक भी देखने को मिल जाती हैं उनको करीब से जानने का अवसर भी मिलता हैं.। कुछ लोग शायद इसलिए भी की वो जीवन में शायद स्वयं को अकेला महसूस करते हो अपनी खुशियाँ दुःख या उपलब्धियाँ बांटने के लिये उन्हें कुछ अच्छे दोस्तों की जरुरत होती हैं इसलिए भी वो फेस बुक का उपयोग करते हैं इससे ज्यादा और बड़ा कारण उनके लिए नहीं होता ऎसे लोगो की फ्रेंड लिस्ट बेहद छोटी और सलेक्टिव भी होती हैं पर वो खुश रहते हैं उससे । परन्तु फेस बुक पर हम जिन विषयों पर चर्चा परिचर्चा या विमर्श करते हैं और कई बार वाद विवाद भी कर लेते हैं उसके लिए क्या ज़मीन की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार रहते हैं या ये सिर्फ फेस बुक स्टेटस अपडेट करने मात्र के लिए हैं ? क्या वास्तविक जीवन में भी हम इन विषयों को लाइक कर गंभीरता से लेते हैं? क्योकि मुद्दे हमारे आसपास के ही होते हैं.।ओर कई बार हमारे अपने जीवन से भी जुड़े होते हैं ओर  हम हमारे जीवन में उन्ही मुद्दों से या परेशानियों से जूझ रहे होते हैं पर फेस बुक पर बड़ी बुद्धिमानी से उन पर न सिर्फ़  विचारविमर्श करते हैं बल्कि एक निर्णायक मोड़ पर ले आते हैं जबकि हम वास्तविक जीवन में बड़े -बड़े ओर अहम् फेसले अधूरे ही अधर में छोड़ देते हैं क्योकि वो एक जोखिम भरा साहसिक कार्य हैं मेरे पास ऐसे कुछ उदाहरण भी हैं जिन पर फेस बुक ओर या अन्य सोशल वेबसाइड पर लोग घंटो बिता देते हैं सामाजिक मुद्दों को लेकर जेसे तलाकशुदा ओरत ओर उसके जीवन से सम्बन्धित परेशानिया ओर समाधान, बाल मजदूरी, भ्रूण हत्या, आत्महत्या, नशाखोरी, गुन्डागर्दी, भ्रष्टाचार, मानव तस्कर,बेरोजगारी, अशिक्षा, गरीबी, बलात्कार ये सारे मुद्दे अब आम विषय ओर चर्चित हो गए हैं कोई भी ओसतन शिक्षित व्यक्ति भी अब इन विषयोंपर घंटो भाषण दे सकता हैं बेहद उच्च शब्दों का प्रयोग कर भले ही उसके अपने घर में उपरोक्त परेशानियों में से कोई एक से भी वो पीड़ित होकर रोज घर में कलह करता होगा, पर विमर्श नहीं होता जेसा की वो फेस बुक मित्रों के साथ करता हैं ...
                             हर दूसरा आदमी उपरोक्त में से किसी न किसी परेशानी से जूझ रहा हैं पर अपनों के बीच जहाँ से ये समस्याए उपजती ओर जिनके बीच रहकर वो जीवन जीता हैं अगर उनके साथ इतना ही हार्दिक, आत्मीय. सहयोग व्यावहारिक  ओर आदरणीयता के साथ बातचीत की जाय तो कम से कम इन समस्याओ के चलते भी परिवारों में मानसिक शांति तो बरक़रार रहेगी ये महसूस भी होगा की सब एक दूसरे की परेशानियों को न सिर्फ़ समझते हैं बल्कि महसूस भी करते हैं एक दूसरे के साथ हैं.... किसी बड़ी समस्या का समाधान हो न हो पर उपरोक्त लिखी सामाजिक समस्याओ में ‘आत्महत्या’ की समस्या जरुर कम की जा सकती हैं क्योकि आदमी जब स्वयं को अकेला जूझता पाता हैं मानसिक रूप से वो प्रताड़ित होकर या किसी से सहयोग प्राप्ति की नाउम्मीदी ही उसे ऐसे कदम उठाने पर विवश कर देती हैं... 
                       मुझे लगता हैं इन विषयों पर हम फेस बुक मित्रों से अगर घंटो बात कर सकते हैं हर आदमी के कमेन्ट्स को पढकर अपनी उदार प्रातक्रिया दे सकते हैं तो अपने परिवार या आसपास के लोगो के साथ वास्तविक जीवन में भी ऐसे ही आत्मीय शब्दों का प्रयोग कर उनके दिल में जगह बनाये उनके साथ बेरुखी ओर उबाऊपन से न पेश आये उन्हें ये न अहसास करवाए के वे घर के हैं या आसपास ही रहते हैं  इसलिए ज्यादा गहरेशब्दों की आवश्यकता नहीं.. .कभी एक प्रयोग करके देखे घर में रहकर या घर के बाहर रहकर घर के किसी सदस्य बच्चे या माता- पिता अगर संभव हो सके तो पत्नी के साथ भी या पत्नी हैं तो पति के साथ आपस में घंटो फेस बुक पर बाते करे उनको सुने, जरुरत होने पर सलाह भी दे ..ठीक वेसे ही विचार -विमर्श या परिचर्चा करे जेसे आप फेस बुक मित्रों के साथ करते हैं बच्चो के साथ ये प्रयोग काफी कारगर साबित हो सकता हैं कितना आनंद महसूस होगा शायद एक दूसरे के साथ ... न सिर्फ़ एक दूसरे के प्रति आदर बढेगा बल्कि आपसी समझ ओर प्रेम भी प्रगाड़ होगा ....
                          ये सत्य हैं वास्तविक जीवन में परेशानियों पर बात करते वक़्त हमारे शब्द ओर बातचीत करने का तरीका ओर हमारा व्यवहार उस विषय को महत्वपूर्ण ओर गंभीरता से लेने पर विवश कर सकता हैं हमारी प्रतिक्रिया ही हमें इस योग्य बनाती हैं की लोग हमसे सलाह से अपनी परेशानिया हमसे बाटे... हमारा balanced ओर supporting nature, गहरी सोच ही हमें किसी परिचर्चा का हिस्सा बना सकती हैं ओर
कभी -कभी किसी समस्या के समाधान का एक महत्वपूर्ण अंग भी... परन्तु ये प्रतिभा कौशल फेस बुक पर लोकव्यवहार करते समय ओर वास्तविक जीवन में व्यवहार दोनों ही पर लागू होना चाहिए तभी आपकी प्रोफाइल वास्तविक हैं अन्यथा शब्दों की जादूगरी से लोगो को जोड़ना या उनसे जुड़ना हमारे नेता ओर मंत्रीगण कर आज उच्च पदों पर आसीन हो कर ही रहे हैं  
              इस बारे में विचार करना भी उतना ही जरुरी हैं जिंतना किसी को फ्रेंड लिस्ट में ऐड करना किसी के स्टेटस को लाइक करना ,किसी को unfriend करना या किसी के स्टेटस पर प्रतिक्रिया का व्यक्त करना। क्योकि हम अपने जीवन का अनमोल समय कहाँ और क्यों दे रहे हैं ये बहुत महत्व रखता हैं समय बेशकीमती हैं सिर्फ़ टाइम पास के लिये तो बिलकुल भी नहीं हैं फेसबुक एक बहुत ही सशक्त माध्यम हैं समय का सदुपयोग कर ऎसे लोगों के बीच अपने विचारों का आदान प्रदान करने का जिनसे हम अक्सर मिल नहीं पाते या अगर मिल भी लेते हैं तो अपने दूसरे महत्वपूर्ण उद्देश्यों की पूर्ति के लिए लेकिन जिनसे सिखने के लिए बहुत कुछ होता हैं या जो हमारे पास हैं उसे बांटने के साथ- साथ उसमें पॉलिशिंग या सुधार करने को बहुत कुछ होता हैं। ये लोग कोई भी हो सकते हैं दोस्त शिक्षक रिलेटिव्स या कोई बड़ा अधिकारी वर्ग या कभी -कभी फ्रेंड्स ऑफ़ फ्रेंड भी सबसे महत्पूर्ण ये हमारे घर के सदस्य भी हो सकतें हैं.. इसलिए अपनाये वास्तविकता से जुड़े शब्दों को जिन्हें हम अपनी नित्य प्रति की जीवन शेली से भी जोड़ सके... अगर आप श्रेष्ठ हैं तो बाहर लाये उसे यथार्थ के धरातल पर , उतना ही आत्मीय,व्यावहारिक होकर, सिर्फ़ लोगो को प्रभावित करने के लिए तो कतई न करे, जबकि आप अपने वास्तविक जीवन में उन परेशानियों ओर मुद्दों से स्वयं जूझ रहे हो... जमीन की लड़ाई लड़े सिर्फ़ शब्दों की नहीं । 

 - शोभा चौहान 26 /मई /2015




मोबाईल कवरेज क्षेत्र में नहीं हैं .......
    ट्रिन ट्रिन ... ट्रिन ट्रिन ....हेलो हेलो अरे आवाज नहीं आ रही
रुको फिर से ट्राय करता हूँ ......शायद कवरेज की प्रोब्लम हैं ...........
ट्रिन ट्रिन ,ट्रिन ट्रिन.. हेलो ......... हाँ अब आवाज आ रही हैं,....
 हेलो... हाँ मेरी आवाज अभी साफ सुनाई दे रही हैं की नहीं .........
हाँ अब थोड़ी आ तो रही हैं पर कट कट के  
रुको थोडा और ऊपर जाकर बात करता हूँ.........
अब तो पहले जितनी भी नहीं आ रही ...............
अब तो बिलकुल भी नहीं आ रही ..............................
एक बार फिर से देखता हूँ लगा कर ...........
हाँ अब बोलो अब तो ठीक हैं [थोड़ी देर बात करते ही फ़ोन कट जाता हैं ]
अरे ये क्या हुआ मैं इतने उपर चला गया फिर भी कवरेज नहीं मिल रहा
कितना मंहगा मोबाईल लिया हैं पर काम पढने पर कभी लगता ही नहीं .................
  यही हैं आउट ऑफ़ कवरेज की तरह हमारा जीवन और जीवन शैली रिश्ते और जीवन दोनों ही आउट ऑफ़ कवरेज होता जा रहा हैं .....................
               
प्रस्तुत आलेख में इस बात को समझने का प्रयास किया हैं की अक्सर कवरेज नहीं मिल पाने की स्थिति में हमारी अपनों या अपने वालो से बहुत आवश्यक बातें भी या पूरी नहीं हो पाती,या फिर सही तरीके से नहीं हो पाती अक्सर फोन भी नहीं लग पाते कोई अति आवशयक काम हो तब... एसी स्थिति में किसी बेहद करीबी को सन्देश देना या उसका हाल जानना उससे बात करना बेहद जरुरी होने की परिस्थिति में बात न हो पाना बार बार फोने कट जाना हमें न सिर्फ़ फ्रस्टेट करता हैं बल्कि कभी- कभी सही वक़्त पर अपनी बात न कह पाने या न सुन पाने के कारण कोई घातक परिणाम भी भुगतने पढ़ सकते हैं ये परेशानी तब ज्यादा कुंठा में डाल देती हैं जब समय पर फ़ोन का बिल भरने और महंगे से महंगा मोबाईल लेने के बावजूद कुछ समस्याएँ उतनी ही महगी साबित हो रही हो ....ये उन कंपनियों की अनियमितता और अपने सेवाओं के प्रति उदासीनता के साथ साथ अपने कंजूमर के प्रति अनिष्ठा और गैर जिम्मेदारी भी जाहिर करता हैं
         लेकिन इन परेशानियों से भी उपर एक अहम बात जब उत्पादक या निर्माता या विक्रेता इस बात को भाप जाय या भली भाती समझ जाय की ये तो जीवन की अब एक अनिवार्य आवश्यकता बन चूका हैं सेवाए केसी भी हो भूख लगने पर रोटी केसी भी मिले अच्छी और जरुरी लगती हैं उसका उपभोग करना ही होता हैं वही स्थिति उपभोक्ता की होती जा रही हैं और वो किसी भी परिस्थिति में जीवन जीने को तैयार हैं उससे होने वाली परेशानियों को सुलझाने के लिये नहीं उसे लगता हैं हम नाह सभी इसका शिकार हैं हम ही क्यों अपना समय और उर्जा लगाये इन मसलों को सुलझाने में....  बस इसी दिशा में जा रहा रहा हैं वर्तमान ...इसे अब एक बार अब जीवन से जोड़ कर समझे जो इसका वास्तविक उद्देश्य हैं  इन्सान रिश्तों और उसकी समझ में हर तरह के कवरेज से बाहर होता जा रहा हैं मोबाईल इसका माध्यम मात्र हैं कुछ परिथितियों वश हो जाते हैं कुछ जानबूझ कर आउट ऑफ़ कवरेज कर लेते हैं दोनों ही बातें अप्रत्यक्ष रूप से हमारे जीवन से जुडी हैं .इसी बात को मोबाईल कवरेज के द्वारा समझने की कोशिश की हैं .....
    जो लोग हमें अच्छी सेवाए हमारे जीवन में दे रहे हैं उदहारण स्वरुप माता –पिता,बड़े भाई बहन,या फिर कोई अन्य क्या हम उनके कवरेज क्षेत्र में हैं कितनी दुरियाँ बना ली हैं हमने सबसे सिर्फ अपनी दुनियाँ में जीने के लिये ...क्या समय पर उन्हें फ़ोन कर पा रहे हैं उनके साथ निभा पा रहे हैं अपनी जिम्मेदारियां और वो अपनापन जो उन्होंने समय समय पर हर परिस्थिति में जितना भी हो सका हमारे लिये किया  ... या असमय हमारा फ़ोन उन्हें  कवरेज क्षेत्र के बाहर ही नजर आता आजकल  हैं या फिर मोबाईल छोड़ो हम स्वयं ही कवरेज के बाहर रहना पसंद करते हैं आजकल ....... या फिर दुसरे पहलु से देखे क्या हम अपनी सेवाए सही ढंग से दे पा रहे हैं घर परिवार और समाज तीनो की बात करे तो, जो हमें सम्पूर्ण कवरेज पाने का अधिकार रहे ... वस्तुए चाहे कितनी भी महंगी हो उनकी असल कीमत वक़्त आने पर वो कितना काम कर पाई उसी से परखी जाती हैं फिर चाहे वो मोबाईल के कवरेज को परखा जाय या रिश्तों की निकटता को रिश्ता कितना भी करीबी हो .केसा भी हो ... जब- जब समय आने पर रिश्ते आउट ऑफ़ कवरेज हुए हैं फिर कवरेज के साथ- साथ दूसरी समस्याएँ स्वतः ही जन्म लेने लगती हैं ठीक वेसे ही जेसे एक छोटी सी बीमारी का सही वक़्त पर इलाज ना होने पर वो अनेक बीमारियाँ अपने आप पैदा कर देती हैं .....जब तक आप रिश्तों के कवरेज में रहते हैं रिश्ते आपके करेज में रहते हैं फिर कभी भी डिसकनेक्ट होना असम्भव हैं आप महसूस करके देखे किसी को अपनी अंतरात्मा से कभी याद करे और कुछ ही दिनों में उसका फ़ोन आ जाय तो केसा महसूस केरेंगे अगर उसी वक़्त फोन आ जाय तो केसा महसूस करेंगे ......ऐसा हमेशा हो जरुरी नहीं कोई वैज्ञानिक कारण नहीं लेकिन अध्यात्म जुड़ा हैं इस छोटी सी बात में जिसे अनुभव भी की गयी हैं ये बात खासतौर पर इसमें अनुभवों के आधार पर कही हैं जो भी अधुरा भी नहीं पूर्ण सत्य हैं इसे हम टेलीपैथी भी कह सकते हैं टेलीपैथी दो व्यक्तियों के बीच विचारों और भावनाओं के उस तबादले को कहते हैं जिसमें हमारी पांच ज्ञानेंद्रियों का इस्तेमाल नहीं होता. ...इसे परामनोविज्ञान अवश्य कह सकते हैं हो सकता हैं आपके जीवन में भी ऐसा हुआ हो की आप किसी को बहुत ज्यादा याद कर रहे हो उससे बात करने या मिलने की इच्छा रख रहे हो और उसका फोन या वो स्वयं कभी- कभी आपके समक्ष उपस्थित हो जाय खैर ये हमारे विषय के बहुत अंदर का विषय हैं इस बात पर हम किसी दुसरे सन्दर्भ में चर्चा करेंगे
      हम जीवन में जब- जब जितने उपर जाते हैं कवरेज प्रोब्लम उतनी ही ज्यादा बढती जाती हैं उचाईयों पर पहुंचने पर भी कवरेज मिलेगा या नहीं इसकी क्या ग्यारंटी क्योकि हम उचाईयों पर तो हर रोज जा रहे हैं बड़े -बड़े मुकाम नेम फेम हासिल कर रहे हैं पर गहराईयों से कोसो दूर होते जा रहे हैं जिन्दगी में भी मोबाईल की तरह अपने संवेदनशीलता और भावनाओं के कवरेज को सदेव मिलाते रहे और इसको  कवरेज क्षेत्र में रखना या न रखना आप पर निर्भर करता हैं कट कट कर रिश्ते निभाना वैसा ही महसूस करवाता हैं जेसे कवरेज नहीं मिल पाने की स्थिति में  कट कट कर कोई जरुरी बात मोबाईल पर की जाती हैं और हम इरिटेशन या चिढ महसूस करते हैं  क्या आपने कभी किसी अपने का या सबसे करीबी इन्सान का अचानक से मोबाईल पूरा दिन कवरेज क्षेत्र के बाहर आते देखा हैं ....अगर आपका जवाब हाँ हैं तो उस वक़्त आपकी प्रतिक्रिया क्या रही होगी कितनी फिक्रमंद और चिंता के साथ आपकी नजरे आपके अपने मोबाईल पर टिकी होंगी इस उम्मीद के साथ कभी अचानक से फोन न आ जाये जो दिन भर से आउट ऑफ़ कवरेज आ रहा हैं.....बस यही फ़िक्र आपकी जिम्मेदारी और अपनेपन का सूचक हैं इसलिए मोबाईल और रिश्तों को जितना कवरेज में रखेगे उतना उनमे प्रगाड़ता आएगी, जिस तरह मोबाईल के साथ थोड़ी सी लापरवाही आपको महंगी साबित हो सकती हैं वेसे ही रिश्तों के साथ इतनी महंगी साबित हो जाएगी की आप चाह कर भी उसे बाज़ार से न तो दोबारा खरीद सकते न रिपयेर करवा सकते सीधे हाथ धो बैठते हैं ..इतनी भी देर न करें चीजों को समझने में, पहल करने में, की वो आउट ऑफ़ कवरेज ही हो जाय ....
       बस यही फर्क हैं रिश्तों और मोबाईल में लेकिन दोनों ही बिना कवरेज के चलना असंभव हैं ये सबसे बड़ी समानता हैं इसलिए रिश्ते भी कट कट कर न निभाए उनकी बैटरी भी फुल चार्ज रखे प्रेम सहयोग सहानुभूति और सम्मान के साथ ....... और उचाईयों के साथ रखे भावनाएं, गहरी संवेदनशीलता और अपनेपन का फुल कवरेज तब देखो न तो रिश्ते अनुपयोगी उबाऊ  और महंगे साबित होंगे न ही मोबाईल.....

     

रविवार, 30 दिसंबर 2012

ओरत का अस्तित्व ............

मेरे कुछ फेस बुक मित्रो ने मुझे massages किये वे मित्र जो शायद मेरे लेखो को निरंतर पड़ते आये हैं उनका कहना हैं की मेने "दामिनी "जेसी इतनी बड़ी दुर्घटना पर अपने कोई विचार नहीं रखे जबकि शायद दुनिया के सभी फेसबुक users अपने -अपने तरीके से कुछ न कुछ कह रहे हैं आज मेने अपने उन सभी मित्रो के सवालो का जवाब सार्वजनिक रूप से दे रही हूँ की इस निर्मम घटना के बारे मैं लिखने मैं मेरे हाथ कांप रहे हैं मैं खुद एक तरह से स्तब्ध रह गयी हूँ इन 30 years मैं पहली बार मुझमे क्रिसमस का सेलिब्रेशन और wishes देने का ख्याल भी नहीं आया और न ही नया साल आने की ख़ुशी हैं जहन मैं /
मैं कल से इस बारे मैं लिखने की हिम्मत जुटा रही हूँ हाथ और मन दोनों कांप रहे हैं जेसे खुद के ही परिवार मैं किसी के साथ ये हादसा हुआ हो ओरत किसी भी उम्र मैं सुरक्षित नहीं हैं

रोज न्यूज़ पेपर की सुर्खिया बन जाती हैं बहु बेटिया और बहनों के बलात्कार की खबरे 4 साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म कर उसे पत्थर से मार कर पानी मैं फेक दिया गया

'' 4 साल की बच्ची हो या 40 साल की ओरत उम्र दर उम्र ओरत तो असुरक्षा का शिकार हो रही हैं''
मेरे दोस्तों बहुत कम लोग जानते हैं "दामिनी "की हत्या का विस्तार शायद मैं उन बद्किस्मतो मैं से एक हूँ जिसे भी पता हैं की वास्तविकता मैं "दामिनी "का बलात्कार किस तरह से हुआ क्योकि शायद आप सभी लोग मेरी इस बात से कुछ हद तक सहमत जरुर होंगे की बलात्कार से ओरत की आत्मा का अंतिम संस्कार होता हैं और शरीर के चित्ड़े ,न की शरीर मरता हैं दोस्तों हम आप इस बात का अंदाजा भी नहीं लगा सकते की दामिनी के शरीर का इस्तेमाल उसके एक एक अंग को किस तरह रोंदा गया उन वहशी राक्षसों के द्वारा इस बारे मैं मेने जब सुना तो 10 मिनट के लिए मेरी सांसे थम गयी और आँखों से आंसू निकल आये और
मैं क्या कोई भी ओरत इसे सुनकर सदमे मैं आ सकती हैं मुझे जबसे इस घटना के बारे मैं विस्तार पूर्वक पता चला गले से खाना और पानी नहीं उतर रहा .......

"दामिनी " जो आज अख़बार टीवी और हर तरह की मिडिया की खबरों का एक अहम् हिस्सा बन चुकी हैं हर जगह विरोध प्रतिरोध और कही न कही ऒरत के अंदर दहशत भी बनकर उभर रही हैं सिर्फ भाव पूर्ण श्रधांजली अर्पित कर देने से क्या हासिल होगा,कुछ दिनों बाद आई -गई खबर बंनने के अलावा और फिर एक दामिनी को विवश होकर किसी वहशी की भूख शांत करने के लिए खुद को सोपना होगा इससे ज्यादा और कुछ नहीं सिर्फ हंगामा सिर्फ हंगामा हैं कुछ दिनों का /घटनाये हर जगह हो रही हैं हर रोज , हर मिनिट मैं हो रही हैं लेकिन सरकार शायद किसी बड़े नुकसान का इंतजार कर रही थी जो इस दामिनी हत्या कांड से उसे मिला एक बात मेरे समझ मैं नहीं आती इस निर्मम दुर्घटना के घटित होने के बाद सरकार के लिए "ओरत की सुरक्षा करना एक मात्र विकल्प बन गया हैं या जरुरत " दोनों मैं बहुत अंतर हैं इस शर्मनाक और घिनोने हादसे के बाद भी अभी तक 13 दिनों से नियमो कानूनों को बनाने पर विचार कर रही हैं अपराधियों का अभी तक कोई अता -पता नहीं इस लोकतान्त्रिक देश मैं सरकार से इससे ज्यादा और कोई उम्मीद रखना बेवकूफी होगी

दुनिया का हर वो आदमी जिसने इस दुर्घटना को फेस बुक के द्वारा या न्यूज़ पेपर के जरिये पड़ा और सुना और देखा हैं शायद ही ऐसा कोई शख्स होगा जिसकी आँखे भीगी न हो जिसकी रूह न कांपी हो फिर चाहे वो एक लड़की का पिता हो या न हो हर शख्स यही महसूस हुआ की ये शर्मनाक हादसा शायद हमारे ही घर मैं हुआ हैं क्योकि मेरे दोस्तों "दामिनी "तो हर घर मैं होती हैं किसी न किसी रूप मैं" सच कहु दोस्तों इस दुर्घटना ने मेरी अन्दर और शायद मेरे जेसी कई ओरतो के मन मैं ओरत होने का खोफ पैदा कर दिया हैं मुझे डर हैं कुछ समय के बाद कही ऐसा न हो जाय की उम्र के जिस पड़ाव पर आकर एक लड़की को उसके ओरत होने का एहसास होता हैं वो अपने आप को प्रकृति के विरुद्ध चलते दुष्कर्मो का शिकार होने से खुद को बचाने के लिए ओरत होने के एहसास के साथ ही खुद को दफ़न न कर ले ,या अपनी आत्मा का अंतिम संस्कार न कर ले

शायद इस वहशी घटना और इस जेसी होती हर रोज ओरत की निर्मम हत्या और उसकी आत्मा का होता हर रोज अंतिम संस्कार उसे इस बात का एहसास दिलाता हैं ओरत होना एक वरदान नहीं अभिशाप हैं ओरत की रचना ईश्वर ने पूजने और सम्मान करने के लिए की थी लेकिन इन्सान प्रकृति के नियमो के विरुद्ध जाकर इस वरदान को अभिशाप मैं बदल रहा हैं ओरत की कोख से जनम लेने वाला आदमी जीसे इस धरती पर लाने का सारा श्रेय ओरत को ही जाता हैं उसके उस शरीर का ही हिस्सा होता हैं, माँ के शरीर की गर्मी ही उसके जीवन का आधार होती हैं उसे जिस ओरत की प्रकृति ने जीवन दिया वही प्रकृति एक ओरत के लिए अभिशाप बन जाती हैं एक आदमी जानवर से ज्यादा वहशी हो गया हैं रूह कांप जाय एक आदमी इतना भयानक कृत्य भी कर सकता हैं इसे इन्सान की उपमा तो नहीं दी जा सकती

और जहा तक न्याय की बात हैं तो मुझे लगता हैं की वो दिन दूर नहीं जब एक ओरत ही एक ओरत की सुरक्षा करेगी उस वक़्त ओरत सिर्फ शरीर से ओरत होगी क्योकि उसके अंदर की संवेदनाये मार्मिकता और गहनता सुकोमलता सुन्दरता मर चुकी होगी क्योकि उसके जीवन का पहला लक्ष्य स्वयं की सुरक्षा करना होगा न की परिवार और पत्ति के लिए जीना क्योकि मैं सिर्फ "दामिनी "की बात नहीं कर रही हूँ परिवार और पति के साथ भी ओरत महफूज नहीं हैं फिर ये तो delhi और इंदौर की सुनी रातो की तन्हाई बया करती सड़के हैं जिसपर रात 9 बजे के बाद सिर्फ शहर के असामाजिक तत्वों या दारू के नशे मैं धुत नशाखोरो का राज होता हैं उनके रास्ते मैं जो भी आएगा वो उसके साथ यही करेगे या इससे भी बदतर ,

मुझे इस बात को लिखने मैं जरा भी शर्म महसूस नहीं होगी की नशे की हालत मैं निम्न वर्गीय वहशी आदमी अपनी ही बहन बटियो और बहुओ को अपने हवस का शिकार बना सकते हैं उन्हें सिर्फ नशे के आलम मैं ओरत के जिस्म से मतलब होगा फिर वो चाहे किसी का भी क्यों न हो उन्हें सिर्फ अपनी हवस पूरा करने का जरिया चाहिए शायद देश के कुछ हिस्सों मैं घर की ओरते इसका का भी शिकार हैं फिर ये तो दुसरे की घर की इज्जत आबरू हैं

कहते हैं एक इन्सान की जिन्दगी मैं सबसे बड़ी ताकत एक ओरत ही होती हैं वो किसी भी रूप मैं हो लकिन एक ओरत की सबसे बड़ी कमजोरी उसका ओरत होना ही होता इस बात मैं गहराई कितनी हैं एक ओरत ही जानती हैं कवी मथिलीशरण गुप्त जी ने ओरत के लिए सही लिखा हैं
" अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी आँचल मैं दूध और आँखों मैं पानी "
ओरत दोनों दशाओ मैं मरती हैं बलात्कार होने के बाद अगर जिन्दा बच गयी तो समाज चरित्रहीनता का आरोप लगा कर एक एक दिन जीना मुश्किल कर देगा वही समाज जिसको बलात्कार होने के बाद अपने बचाव मैं आत्मसमर्पण न करते हुए ओरत शहादत को प्राप्त हो जाना मंजूर हैं वही ओरत महान होगी समाज की नजर मैं जेसे "दामिनी " क्या चरित्र के मानदंडों को, समान रूप से, पुरुष पर लागू करने की आवश्यकता नहीं?

ओरत को ही शायद इस समाज की इसी तस्वीर बदलनी होगी ..उसे खुद ही अपनी सुरक्षा करनी होगी , अपने आप को इस समाज में रहने लायक सक्षम बनाना होगा …सरकार समाज न्याय और नियम उसकी सुरक्षा नहीं कर सकते वो सिर्फ श्रधांजलि, सांत्वना दे सकते हैं यहाँ तो बलात्कार होने के भी साबुत देने होते हैं

खेर ये एक ऐसा विषय हैं जिस पर सिर्फ लिखना इस विषय के साथ नाइंसाफी होगी बह्तरी तो तब होगी जब इन पर लिखे लेखो से इन घटनाओ पर अंकुश लगेगा सिर्फ लिखने से आप अपने आपको ही शांत कर सकते हो अपने मन के विचारो को संतुलित कर सकते हो, ओरत को अपनी सुरक्षा का जिम्मा खुद ही लेना हो /चाहे , वो परदे मैं रहकर अबला नारी बन जाय या फिर दबंगता से अपने सम्मान और अस्मिता को बचाने के लिए कुछ भी कर जाये फिर चाहे अपनी जान से ही हाथ क्यों न धोना पड़े, कोई बचाने आएगा इस इंतजार मैं तो सबकुछ लूट जायेगा पता नहीं रक्षक ही भक्षक न निकल जाये 

और शायद इस बात को भी कही न कही नकारा नहीं जा सकता की ओरत के लिए जमाना कभी नहीं बदलता ओरत को हर सदी मैं अपनी सीमाओ और हदों को प्राथमिकता देनी होगी चाहे वह कितने हि उपलब्धिया हासिल कर ले ,कितने भी सफलता को छु ले पर उसे ये कभी नहीं भूलना हैं की वो पहले एक ओरत हैं ,आखिर प्रकृति ने भी कुछ सोच समझ कर ओरत की  शारीरिक रचना को  इतना कोमलांगी उसे बनाया हैं इतना आकर्षक उसकोबनाया हैं जरुर किसी खास उद्देश्य को पूरा करने के लिए ही बनाया होगा अपनी मूल्यवान धरोहर को सहेजना और छुपाना भी उतना ही अनिवार्य हैं/ खुबसूरत वस्तुए बाजार मैं बिकने के लिए ही खुले आम अपना प्रदर्शन कर बेचीं जाती हैं उनकी खूबसूरती का  खुले आम बाजार मैं प्रदर्शन वाजिब हैं/ पर ओरत जिसकी रचना की कुदरत ने इतनी शिद्दत और कशिश  से की हैं की हैं  वो तो फिर एक जीता जागता इन्सान हैं वो बाजार मैं बिकने के लिए अपना प्रदर्शन न कर खुबसूरत वस्तुओ और स्वयं मैं अंतर रखे वरना दुनिया के बाजार मैं खरीदारों की कमी नहीं अपना मूल्य बाजार मैं बिक कर हासिल करना हैं या या इतना अमूल्य बनाना हैं की,  किसी खरीदार की नजर भी न पड़ सके ?क्योकि बाजार तो बिकने वालो के लिए ही होता हैं और इस बाजार मैं अपने को सहेजना ही सुरक्षा की पहली सीड़ी हैं या तो पाश्चात्य सभ्यता को छुने की कोशिश मत करो और हिमाकत की हैं तो सिर्फ कपड़ो मैं क्यों ?किसी भी देश की संस्कृति  वहा के वातावरण परिवेश, विचारो और जीवन शेली के खुले पन पर निर्भेर करते हैं अगर हम अपने देश की प्रकृति और वातावरण और जीवनशेली के विरुद्ध कोई काम करेंगे तो वो सिर्फ हमारे लिए संतुष्टि प्रद होगा लेकिन दुनिया के लिए शायद एक ही शब्द होगा "नुमाइश" और उसमे भी अगर अति नजर आई तो शायद इस तरह के अपराधो का बीज अंकुरित होने लगता हैं प्रकृति के विरुद्ध जब भी कोई काम हुआ हैं उसके परिणाम विनाशक और बरबादिया लेकर ही आये हैं इसलिए प्रकृति के नियमो और रचना के साथ किसी भी रूप मैं छेड़ -छाड़ न करे क्योकि नदी भी जब अपने किनारे तोड़ देती हैं तो परिणाम बाड़ ही आती हैं जिसमे सब बर्बाद हो जाता हैं जब एक नदी के लिए दो किनारे बने हैं उसकी सीमाए निर्धारित हैं तो फिर हम तो इन्सान हैं हमें  इनका उल्लघन करने का कोई अधिकार नहीं 
इस बात मैं भी कोई शक नहीं की ओरत के साथ साथ समाज को भी अपने दायरे और महत्व की गरिमा का ध्यान रखना होगा क्योकि अगर एक ओरत सीमाओ का उल्लंघन कर बरबादियो का शिकार बनती हैं वही कुछ ओरत के ऐसे रूप भी होते हैं 
जहा पुरुष द्वारा त्यागी गयी ओरत और विधवा होकर एकाकी जीवन व्यतीत कर रही हो या दहेज़ की कमी के चलते कुवारी जीवन व्यतीत कर रही होगी तो भी समाज उसे घिनोनी नजरो से देखता हैं और इंतजार करता हैं उसे किसी भी तरह से अपनी हवस का शिकार बनाने, का उसकी विवशताओं के चलते/ मानसिक प्रतारणा के साथ  साथ इन परिस्थितियों मैं ओरत को शारीरिक प्रतारणा का भी ख़ुशी से स्वागत करना पड़ता हैं उसके पास कोई और विकल्प ही नहीं रह जाता /
पर दूसरी तरफ अगर एक पुरुष इस परिस्थिति से गुजरता हैं  जिसकी पत्नी ने उसे त्याग दिया और जिसकी पत्नी की मृत्यु हो गयी ,या घर की ख़राब परिस्थितियों के चलते उसका विवाह नहीं हो रहा हो तब क्या पुरुष समाज की प्रतारणा का शिकार होता हैं क्या उसके चरित्र पर कभी ऊँगली उठती हैं?क्यों नहीं ?क्योकि ओरत को समाज ने कभी नातिक समर्थन नहीं दिया समय दर समय ओरत का अस्तित्व नग्न ही रहाहैं बाँस के रूप मैं एक ओरत को देखना पुरुष को कभी रास नहीं आया ,ओरत की विडम्बना भरी जिन्दगी होती हैं अगर वह घर के बाहर अपना वजूद तलाशे  तो परिवार पति और बच्चो की उपेक्षा से उसे आत्मग्लानी होती हैं लेकिन अगर वह परिवार के हितो के लिए घर मैं ही बैठि रहे तो भी उसके त्याग को सही तरह से न  तो समझा जाता हैं न सराहा न ही सम्मान जनक रूप से देखा जाता हैं छोटी छोटी जरूरतों के लिए उसे पुरुष पर निर्भेर रहना पड़ताहैं वो भी उपेक्षा और तिरस्कार के साथ जिसके फलस्वरूप मानसिक रूप से बीमार होकर अपनी सीमाओ से बिखर जाती हैं और अपने लिए नए रास्ते चुनती हैं वही रास्ते जो प्रकृति के नियमो के विरुद्ध भी हो सकते हैं
मेरा दावा है कि जो लड़का अपने परिवार में, पिता द्वारा, माँ/ बहनों का सम्मान होते हुए देखता हो. जिसने बालपन से माँ, बहनों का स्नेह पाया हो; शिक्षित, शक्तिरूपा माता द्वारा संस्कार और मार्गदर्शन पाया हो- वह कभी भी किसी ओरत के साथ किसी भी तरह के अपराधिक कार्य नहीं कर सकता  
  किसी भी तरह के आंकलन को ओरत के साथ साथ पुरुष पर भी लागू करने की आवश्यकता हैं 


शोभा चौहान 30/dec /2012

रविवार, 16 दिसंबर 2012

माँ

माँ
माँ शब्द मैं छिपा हैं स्रष्टि का सारा सार 
माँ मैं छिपा हैं जीवन का सारा प्यार 
माँ से सुंदर नहीं दुनिया की कोई कृति 
चाँद सूरज नदी हवाए माँ के अंदर बसी 
माँ के दूध मैं अमृत सा जीवन मिलता हैं 
माँ सीने से लगा ले तो सुकून मिलता हैं 
दुःख दर्द भूख प्यास आंसू का आभास हैं 
दुनिया मैं सबसे सच्चा माँ का विश्वास हैं 
माँ की कोई उपमा नहीं होती 
आंसू मेरे गिरते ,और माँ रोती 
माँ वो एहसास जो समय के साथ गहराता हैं 
गलती के परिणामो पर माँ का हर लव्स याद आता हैं 
माँ संवेदना माँ भावना माँ कल्पना माँ मैं सब अपना 
माँ मैं पलता हैं जीवन का हर सपना 
माँ तू दर्द में मुझे सहला देती कराह सुन पसीना पोछ देती 
सपनो को पंख देती होसलो को ऊँचा कर देती 
माँ तेरा वो सुकून देता स्पर्श, कोमल व्यक्तित्व 
तेरी लोरी और थप थपि याद दिलाती मेरा अतीत 
माँ तुझसे अटूट न रिश्ता दूजा 
माँ तू जेसे भगवान की पूजा 
दूध का कर्ज कलम बया नहीं कर पायेगी 
बंद पलकों मैं सिर्फ तू ही सहलाएगी 
एक मैं हूँ जिसे माँ की चिंता नहीं रहती 
एक माँ हैं जिसे मेरे सिवा किसी की चिंता न रहती 
भूली नहीं हूँ अपनी इस गलती के अहसास को 
भुला दिया माँ की सिखाई हर बात को 
माँ एक तू हैं जो हर बार गलतिया माफ़ कर  देती हैं 
न सवाल पूछती हैं, जवाब खुद आप कर  देती हैं 
मेरी गलतिया जो माफ़ी के काबिल नहीं
मेरी गलतिया जिनका कोई साहिल नहीं 
माँ मेरे प्रायश्चित का नहीं कोई छोर 
माँ तुझसे सच्चा रिश्ता नहीं कोई और 

शोभा चौहान 16/दिसम्बर 2012

रविवार, 4 नवंबर 2012

कमल का संग कीचड़ से ........


कमल का संग कीचड़ से 
गुलाब का संग काँटों से
                        कुछ यू हो गया की 
निर्बल का बल बलवान से 
इन्सान पर छल हेवान का 
                        कुछ यू हो गया की 
आशा का संग निराशा से 
उजाले का संग अंधकार से 
                      इसलिए हो गया की 
अच्छाई और बुराई मैं अंतर हो जाये 
अच्छाई छाई रहे और बुराई राइ हो जाय
                      कुछ यू हो जाय 
आरजू पूरी हो पहले चाहो से
हर बाधा हट जाय पहले रहो से ........
                                       शोभा चौहान ..........