लगातार टालते रहने से अक्सर निर्णय बदल जाते है। अप्रत्याशित बदले हुए निर्णयों को स्वीकारना बेहद दुष्कर होता है।अपनी मानसिकता को दोनों परिस्थितियों के लिए तैयार रखे जो परिणाम आप देखना चाहते है और जो नहीं देखना चाहते है फिर किसी के भी जीवन में कुछ अप्रत्याशित घटित ही नहीं होगा । हम सबके भीतर एक भीड़ छिपी होती है जो हमें कुरेदती है,पथविमुख करने को उतावली रहतीहै,अक्सर लोग निर्णायक की भूमिका निभाना चाहते है किन्तु परिणामों के लिए उनके पास कोई विकल्प नहीं---शोभाजैन Protected by Copyscape

शुक्रवार, 9 जून 2017

स्त्रियों के अधिकारों के बारे में गांधी जी के विचार इस प्रकार थे – “स्त्रियों के अधिकारों के सवाल पर मैं किसी तरह का समझौता स्‍वीकार नहीं कर सकता। मेरी राय में उन पर ऐसा कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए जो पुरुषों पर न लगाया गया हो। पुत्रों और कन्‍याओं में किसी तरह का कोई भेद नहीं होना चाहिए। उनके साथ पूरी समानता का व्‍यवहार होना चाहिए।”
''गांधी जी ने महिलाओं के अधिकारों की वकालत करते हुए लिखा है कि अहिंसा की नींव पर रचे गये जीवन की रचना में जितना और जैसा अधिकार पुरुष को अपने भविष्‍य की रचना का है, उतना और वैसा ही अधिकार स्‍त्री को भी अपने भविष्‍य तय करने का है।”

गुरुवार, 8 जून 2017

“देश के बारे में लिखे गये हजारों निबन्धों में लिखा गया
पहला अमर वाक्य एक बार फिर लिखता हूँ
भारत एक कृषि प्रधान देश है
दुबारा उसे पढ़ने को जैसे ही आँखें झुकाता हूँ
तो लिखा हुआ पाता हूँ कि पिछले कुछ वर्षों में डेढ़ लाख से अधिक किसानों
ने आत्महत्या की है इस देश में।”
   ‘(इस आत्महत्या को कहाँ जोड़ूँ’ कविता से)...
                                       ---कवि राजेश जोशी

सोमवार, 5 जून 2017


हमारे दादाजी ने नदी में पानी देखा/
पिताजी ने कुए में/
हमने नल में देखा / 
बच्चों ने बोतल में /
अब उनके बच्चे कहाँ देखेंगे....????
सवाल चिंतन का है।
व्यर्थ बर्बाद न करें पानी !
 जल ही जीवन
इसे स्वच्छ एवं संचित करे

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

नीतिशतक में हमें यह जानने को मिलता है कि ‘इस जगत में निम्न (नीच) प्रकृति के लोग विघ्न-बाधाओं के भय से कोई कार्य आरम्भ ही नहीं करते हैं; मध्यम श्रेणी के लोग किसी कार्य को आरम्भ तो करते हैं, किन्तु विघ्न (या परेशानी) के आ जाने पर, वे उस कार्य को अधूरा ही छोड़ देते हैं; तथा श्रेष्ठ पुरुष बार-बार विघ्न के आने पर भी अपने कार्य को अधूरा छोड़ते नहीं; वे उसे पूर्ण (करके ही विश्राम ग्रहण) करते हैं |’
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचै: प्रारभ्य विरमन्ति मध्या: |
विघ्नै: पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमाना: प्रारब्धमुत्तमजना न परित्यजन्ति ||
|| भर्तृहरि, नीतिशतक २७||

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

नशा आपरेशन .............

नशा आपरेशन।।।।।।

संस्कृत में एक सूक्ति है ---अति सर्वदा वर्जयेत शराबखोरी जैसी देश की भीषण समस्या पर यह सूक्ति सबसे अधिक सही सिद्ध होती है | पूर्ण नशाबंदी के लिए के लिए युद्ध स्तर पर कार्यरत होने की नितांत आवश्यकता है | शराब ‘ शब्द अरबी भाषा का शब्द है और इस का मतलव होता है बुरा पानी . ‘शर’ अर्थात बुरा और ‘आब ‘ का अर्थ पानी | स्वतंत्रता  के ६९  वर्षों  बाद भी सरकार सफलतापूर्वक शराबबंदी लागू नहीं कर सकी है कुछ राज्यों को छोड़ दें तो । शराबबंदी के खिलाफ राजस्व के घाटे का भय  तो कभी आमदनी बढ़ने से विकास की गति तीब्र होने का लालच दिया जाता है ।मुट्‌ठी भर लोग ही बचे हैं जो नशाबंदी के विरुद्ध जोरदार आवाज या कोई कदम उठाने की क्षमता रखते हों ।क्योकि इसमें पुरुषों की अपक्षा महिलाओं की भागीदारी अधिक रहती हैं | केंद्र सरकार ने जनता से कालाधन मुक्त भारत के वादे के अनुसार नोटबंदी का ऐलान किया तो वहीं बिहार सरकार ने महिलाओं से किए अपने वादे के अनुसार पूरे प्रदेश में शराबबंदी का फैसला किया।शराबबंदी की मूल वजह प्रदेश में घरेलू हिंसा ,असहजता आदि को खत्म कर समाजिकता को बढ़ावा देना है। शराबबंदी के बाद से बिहार सरकार को करीब 4000 करोड़ का वार्षिक रूप से घाटा हो रहा है मगर परोक्ष रूप से देखे तो प्रदेश में शराबबंदी के बाद से सड़क दुर्घटना, मारपीट आदि की घटनाओं में कमी तो आई ही है। साथ ही गरीब वर्ग के लोगों की जिंदगी में राहत भी लाई है जो कि एक फायदे का सौदा है। नितीश कुमार जी  का यह कदम अभिनन्दनीय है  बिहार में शराब का प्रयोग बंद कर दिया गया है  यह कदम किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं है . इस कदम से उन शराबी तथा शराब के विपणन से लाभ लेने वाले सारे लोगों का प्रारंभिक विरोध सरकार को झेलना पड़ेगा और कहीं न कहीं यह आज बिहार में परिलक्षित हो रहा है | शराब शारीरिक,मानसिक,नैतिक और आर्थिक दृष्टि से मनुष्य को बर्बाद कर देती है . शराब के नशे में मनुष्य दुराचारी बन जाता है , वहीँ चेहरा जो शराब पिने से पहले प्यारा आकर्षक ,प्रसन्न , विचारशील लगता रहता है वही शराब के आदि होने पर घृणास्पद,निकृष्ट,खूंखार,असंतुलित ,अनियंत्रित और वासनात्मक भूखे भेड़िये के सामान लगता है.
यह सभी जानते हैं की शराब हमारे देश में घरेलु हिंसा,सड़क दुर्घटना और लीवर तथा किडनी सम्बंधित बिमारियों की सबसे बड़ी वजह है. शराब गृहस्थियां बर्बाद कर देती है. शराब युवा को अकाल मृत्यु की ओर अग्रसर करता है. शराब मस्तिष्क के संचार तंत्र को धीमा कर दुर्घटनाओं का कारण बनती है, और धीरे -धीरे मनुष्य कि सोचने कि शक्ति को ख़त्म कर देती है. शराब एक मनोसक्रिय ड्रग है,जिसमें अबसादकीय का प्रभाव होता है. एक उच्च रक्त अल्कोहल सामग्री को सामान्यतः क़ानूनी मादकता माना जाता है,शराब के रोगियों में 27 प्रतिशत मस्तिष्क रोगों से 23 प्रतिशत पाचन-तंत्र के रोगों से ,26 प्रतिशत फेफड़ों के रोगों से ग्रस्त रहते हैं.शराब से जितने राजस्व की प्राप्ति होती है उससे ज्यादा धन खर्च तो शराब के कारण होने वाले दंगे -फसाद ,लड़ाई-झगडे,दुष्कर्म की रोकथाम,दुर्घटनाओं की रोकथाम,कानून व्यवस्था बनाए रखने,कार्य क्षमता की हानि,कार्य दिवसों की कमी के कारण सकल घरेलु उत्पाद में होने वाली कमी ,जेल व्यवस्था और शराब के कारण होने वाली बिमारियों की रोकथाम व उपचार पर खर्च हो जाता है.
               हमारे प्रधान मंत्री जी बिहार के मुख्यमंत्री की तरह या जिस तरह उन्होंने स्वयं गुजरात में बन्द करवायी थी उसी तरह कठोर कदम उठाकर शराब मुक्त देश घोषित करना चाहिए .उनके इस कदम से फिर से हमारा भारत सुसंस्कृत होकर ऋषि मुनि के देश हो जायेग .देश के हर नागरिक सफलता की सोपान पर चढ़ जायेगा ,देश के हर मानव पवित्र आचरण यानी क्लीन हैबिट का बन जायेगा .

                                                 ------                                       -कुछ पत्र पत्रिकाओं का समीक्षात्मक संकलन ..
आज स्त्री-विमर्श की चर्चा हर ओर सुनाई पड़ रही है। महादेवी ने इसके लिए पृष्ठभूमि बहुत पहले तैयार कर दी थी। सन्‌ १९४२ में प्रकाशित उनकी कृति ’श्रृंखला की कड़ियाँ’ सही अर्थों में स्त्री-विमर्श की प्रस्तावना है जिसमें तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों में नारी की दशा, दिशा एवं संघर्षों पर महादेवी ने अपनी लेखनी चलायी है।
महादेवी वर्मा की कवितओं में मन की गहनतम अनुभूतियों की अभिव्यक्ति मर्मस्पर्श रूप में हुई है। प्रेम और श्रृंगार के भाव को मर्यादित तरीके से व्यक्त किया गया है।गीतों में तो लगता है महादेवी के मन की पीड़ा स्वतः बह पड़ी है। मानो यह पीड़ा एक ऐसी दीपशिखा है जो उनके मन में निर्धूम जला करती है और जिसकी खुशबू का अहसास हर पाठक करता है, क्योंकि यह पीड़ा केवल महादेवी की न होकर हम आप सबकी हो जाती है।

सोमवार, 13 मार्च 2017


होली के रंगभरे उत्सव पर एक रचना आप सभी के लिए 

                   रंगों वाला गाँव --

होली  के रंगों में छिपे ,जीवन के हर रूप।
जीवन सबका उत्सवमयी हो,खिले फागुनी धूप ।
इंद्र धनुष के रंगों सा, जीवन ले सबका रूप,
होली में सदभाव हो, जग का उज्ज्वल रूप ।
जीवन की यह व्यस्तता, कभी न होगी कम,
बस रंगों को नाम न दें, जीकर देखे हम ।
सुंदर और सार्थक बने रंगों सा जीवन,
 जैसे उत्सवमयी कृष्ण का मधुबन।
पुनः भूला दें ह्रदय मन से गहरा रागों द्वेष,
जैसे निश्छल थे अपने बचपन के अवशेष ।
महानगर सा एकाकी न हो, उत्सव का यह भाव,

इस होली शहर बन जाय रंगों वाला गाँव ।  

                     --शोभा जैन 

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

अक्सर हम वर्तमान के यथार्थ को ही स्वीकार करते हैं , भावी आशंकाओं को नहीं।...शोभा जैन 

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

मैं दीवार से सर टकरा के उसे तोड़ तो नहीं सकता लेकिन सिर्फ़ इसलिए संतोष करके बैठ नहीं सकता कि वह दीवार पत्थर की है और मेरे पास ताक़त नहीं है. 
- दास्तेव्य्सकी (नोट्स फॉर्म द अंडरग्राउंड)
कृतयुग का आगमन, जो बोला गया है उसे पूर्ण कीजिये ।
समस्त कालगणनाओं का अंत, एक नये कल्प का शुभारम्भ ॥

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

                                                              अपनी बात -
स्त्री के की उन्नति में सबसे बड़ी बाधाएं समाज की रुढ़िवादी परम्पराएँ है | साहित्य में स्त्री आत्मकथाएँ सिर्फ व्यथा कथाएँ नहीं हैं बल्कि तमाम तरह की पितृसत्तात्मक चुनौतियों को स्वीकार करते हुए स्त्री के बनने की कथाएँ हैं। इस बनने के क्रम में बहुत कुछ जर्जर मान्यताएँ टूटती हैं लेकिन जो बनती है उसे पहले आलोचना के साथ बाद में  उसके अस्तित्व को पूरी दुनिया स्वीकार करती है बल्कि उसके उदाहरण भी देती है ।
                         
महज़ एक दिन महसूस किये जाने वाले 'प्रेम दिवस ' पर एक कविता

        कुछ प्रीत निभा लें ..

             -शोभा जैन

चलों आओं थोड़ी सी ‘रीत’ निभा लें
कुछ कहने सुनने में ‘प्रीत’ निभा लें
कुछ ऐसा हो जो अपनों को अपनों से मिला लें  
चलों आओं थोड़ी सी रीत निभा लें
कुछ कहने सुनने में प्रीत निभा लें|
बोये बहुत हैं कांटें कुछ गुलाब अब लगा लें
चलों आओं थोड़ी रीत निभा लें
कुछ कहने सुनने में प्रीत निभा लें|
क्षमा दें उन्हें, खुद गलतियों की सजा लें
चलों आओं थोड़ी सी रीत निभा लें
कुछ कहने सुनने में प्रीत निभा लें|  
ये अभिमान,अहंकार, की सीमाएं मिटा लें
चलों आओं थोड़ी सी रीत निभा लें
कुछ कहने सुनने में प्रीत निभा लें|
स्वप्न जो बिखरे हैं उन्हें आँखों में बसा लें
चलों आओं थोड़ी सी रीत निभा लें
कुछ कहने सुनने में प्रीत निभा लें
छोड़ दुनियाँ से छाँव की उम्मीद
बस प्रेम की पनाह लें
चलों आओ थोड़ी सी रीत निभा लें
कुछ कहने सुनने में प्रीत निभा लें |


गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017


अर्धनारेश्वर 
अपनी बात -- नर श्रम करके तपता है,नारी रात्रि बनकर उसे शांति प्रदान करती है|नारी विभिन्न रूपों में नर की प्रेरणा रही है |इसीलिए पुरुष को अर्धनारेश्वर की संज्ञा दी जाती है क्योकि वह स्त्री के बिना अपूर्ण है |और यही दोनों की नियति है |--शोभा जैन 

रविवार, 5 फ़रवरी 2017

- अपनी बात :- स्त्री की प्रगति में समाज की रूढ़ियाँ सबसे बड़ी बाधक है |--शोभा जैन 

गुरुवार, 26 जनवरी 2017


गणतंत्र दिवस पर आलेख 

                                  गणतंत्र दिवस पर आलेख
                                       ‘अपना गणतंत्र स्वयं रचे’
                                             --शोभा जैन


 गणतंत्र एक शब्द है किन्तु जिम्मेदारियों से भरा |अगर इसका आशय लिया जाये तो मनुष्यों के एक ऐसे समूह का दृश्य सामने आता है जो उनको नियमबद्ध होकर चलने के लिये प्रेरित करता है। कहा जाता है मनुष्य सबसे बुद्धिमान प्राणी है धरती पर शायद सबसे अधिक बुद्धिमान होने के कारण उसके ही अनियंत्रित होने की संभावना भी अधिक रहती है। विश्व के जीवों में एक मनुष्य ही ऐसा है जिसे राज्य व्यवस्था की आवश्यकता है। क्यो क्योकि राज्य, संकट पड़ने पर प्रजा की मदद करता है।यह गणतंत्र का मूल सिद्धांत है पर यह एक तरह का भ्रम भी है। प्रथम अपराध करने वाले के मन में उसके परिणामों का ‘भय’ जरा भी नहीं |दूसरा याचक को न्याय मिलते -मिलते उसकी आयु ही उसका साथ छोड़ने लगती है |यह एक भ्रम ही प्रतीत होता है की  गणसमूह और उसका तंत्र व्यक्ति के जीवन को सुलभ बनाता है |धन, पद और अर्थ के शिखर पुरुषों का समूह गणतंत्र को अपने अनुसार प्रभावित करते हैं जबकि आम इंसान केवल शासित है। अगर आदमी को अकेले होने के सत्य का अहसास हो तो वह कभी इस भ्रामक गणतंत्र की संगत न करे। न्याय के नाम पर केवल नियमो की पंक्ति है और अंतिम पंक्ति तक पहुँचते -पहुँचते वह स्वयं को ही अपराधी महसूस करने लगता है |कहने का अर्थ वह वह इस गणतंत्र का प्रयोक्ता है न कि स्वामी। स्वामित्व का केवल भ्रम है मनुष्य को अपना जीवन संघर्ष अकेले ही करना है। ऐसे में वह अपने साथ गणसमूह और उसके तंत्र के साथ होने का भ्रम पाल सकता है पर वास्तव में ऐसा होता नहीं है। निरर्थक संवादों से गणतंत्र को स्वयं से संचालित होने का यह भ्रम हम अनेक लोगों में दिन प्रतिदिन बढ़ते क्रम में देख रहे हैं ।नियमों का लचीलापन ही अपराध करने का साहस बढाता है क्योकि अपराध सिद्ध होते- होते इतना लम्बा समय निकल जाता है की याचक का आक्रोश स्वतः ही ठंडा पड़ जाता है किन्तु जो उसने खोया इन वर्षों में उसकी भरपाई उसे कभी कोई न्याय व्यवस्था नहीं कर पाती |बदले में उसे जो मिलता है वो केवल सहनशीलता का पाठ |सहनशीलता, सरलता और कर्तव्यनिष्ठ से ही वह अपना जीवन संवार सकते हैं।जिनके पास ये नहीं हैं वो आक्रामक तरीके से उभरकर सामने आते है अनावश्यक और निरर्थक बहसें और वादविवाद कर स्वयं को सही साबित करने का प्रयास करते हैं |मेरा ऐसा मानना है गणतंत्र से ज्यादा शीघ्र और संतुष्टिप्रद न्याय ‘आध्यात्म’ देता है| इसलिए अपना गणतंत्र स्वयं बनायें |अगर आदमी को अकेले होने के और स्वयं से द्वंद करने के सत्य का अहसास हो तो वह कभी इस भ्रामक गणतंत्र की संगत न करे।मेरी दृष्टि में गणतंत्र केवल एक भ्रम ही तो है |देश को चलाने के लिए क्या सचमुच  एक सविंधान और कानून की आवश्यकता है अगर वास्तव में हाँ तो क्या कानून व्यस्था अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में खरा उतर रही है |सच को सच साबित करने में १० वर्ष लग गए |तलाकशुदा स्त्री को न्याय पाने में कम से कम ६-७  वर्ष लग गए| मदद के रूप में उधार दिये गए पैसों को वापस पाने में ५  वर्ष लग गए|इन वर्षों में जो खोया उसकी कीमत कभी नहीं मिल पायेगी| गणतंत्र झुण्ड हो सकता है आदमी का किन्तु झुण्ड का होना कितना सार्थक होता है ये कहने की आवश्यकता नहीं | शायद गणतंत्र भ्रम ही है |न्याय केवल आप खुद से लड़कर ही पा सकते हो लोगो के झुण्ड द्वारा बनायीं गई नीतियाँ और नियम राज्यव्यवस्था चलाने के लिए उचित हो सकते है जिसके तहत व्यावसायिक अनुबंध राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय स्तर के विमर्श हो सकते हैं किन्तु एक आम आदमी का जीवन चलाने में ये खरा नहीं उतर पाया | ये केवल नियमों की पंक्ति बनकर रह गया हैं शायद ये भ्रम ही आदमी को शिक्षित होने का आभास कराता है की उसे ‘गणतंत्र’ का आभास है वो एक लोकतान्त्रिक देश का नागरिक है भले ही वो उसकी जरूरतों की सही समय पर पूर्ति न कर सके | इसीलिए शायद आदमी को अपना गणतंत्र स्वयं रचना चाहिए स्वयं को नियमों में बांधे न की नियमों पर चलने पर विवश होना पड़े |उसका रचा गणतंत्र उसे न सिर्फ स्वयं पर जीत हासिल करवाएगा बल्कि उसके भीतर एक कर्मठ सहनशील व्यक्तित्व  का निर्माण भी करेगा |
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गुरुवार, 5 जनवरी 2017


जो दिया तुमने .......
   -- शोभा जैन 

पाया तुममें, सार्थक जीवन, आत्मचेतना, गहन चिन्तन|
भीड़ से अलग खुद को, बौना पाया हर दुःख को |
व्यथा ‘उसकी’ स्वयं जीकर, दिया उसका स्वयं ‘मूल्य’
तुम्ही शिक्षक, तुम्ही प्रेरणा,साथी तुम अतुल्य|
करुणा तुम, संवेदन तुम, ‘उन्मुक्त’ रहो वो ‘बंधन’ ‘तुम’
सोच में इत्मिनान तुम, खुद में एक सायबान तुम,
छोड़ दुनियाँ से छाँव की उम्मीद,खुद अपनी पहचान तुम |
मेरे अन्तस् की ‘धूप’ मेरी पूरी दुनियाँ, मेरा गाँव ‘तुम’|
मेरे सृजन के शिखर ‘तुम’ मौन ‘मैं’ शब्द मुखर ‘तुम’
नेपथ्य में उजास ‘तुम’, मेरी धरती मेरा आकाश ‘तुम’ |
मेरे प्रतिबिम्ब का आकार तुम,एक अनोखा संसार ‘तुम’
तुम ही आलोक, मेरी देह, मेरा प्राण तुम,
मैं ‘जीवंत’ मेरा ‘निर्वाण’ ‘तुम’|
इस बात को कितने संकोच से स्वीकार करते हो,
बेपरवाह बाधाएं पार करते हो |
अब शेष नहीं कुछ भी,
जो टीस बने मन की|
ये शब्द आत्माभिव्यक्ति है ‘मेरे’ ह्रदय और मन की|
न कह सकूँ न रख सकूँ, है यही ‘निष्कर्ष’ अब,

जो दिया ‘तुमने’ बस उसे सार्थक कर सकूं | 

सोमवार, 26 दिसंबर 2016

पिता जब नाराज होता है तो आसमान के एक छोर से दूसरे छोर तक कड़क जाती है बिजली, हिलने... लगती है जिंदगी की बुनियाद। पिता जब टूटता है तो टूट जाती हैं जाने कितनी उम्मीदें, पिता जब हारता है तो पराजित होने लगती हैं खुशियां। 

रविवार, 18 दिसंबर 2016

विपदायें आते ही,
खुलकर तन जाता है ;
हटते ही
चुपचाप सिमट ढीला होता है ;
वर्षा से बचकर
कोने में कहीं टिका दो,
प्यार एक छाता है
आश्रय देता है, गीला होता है.

-----सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

गांवों के शहरीकरण की बजाय  गांवों का शहरों में सिर्फ स्थानान्तरण होना ,  गांव और ग्रामीण से शहर और नगर की ओर संक्रमण की  यंत्रणा बनकर रह गई है |
मेरी प्रिय कविताओं में से एक महाकवि नरेश मेहता जी की -

हम अनिकेतन
हम निकेतन, हम अनिकेतन
हम तो रमते राम हमारा क्या घर, क्या दर, कैसा वेतन?

अब तक इतनी योंही काटी, अब क्या सीखें नव परिपाटी
कौन बनाए आज घरौंदा हाथों चुन-चुन कंकड़ माटी
ठाट फकीराना है अपना वाघांबर सोहे अपने तन?
हम निकेतन, हम अनिकेतन

देखे महल, झोंपड़े देखे, देखे हास-विलास मज़े के
संग्रह के सब विग्रह देखे, जँचे नहीं कुछ अपने लेखे
लालच लगा कभी पर हिय में मच न सका शोणित-उद्वेलन!
हम निकेतन, हम अनिकेतन

हम जो भटके अब तक दर-दर, अब क्या खाक बनाएँगे घर
हमने देखा सदन बने हैं लोगों का अपनापन लेकर
हम क्यों सने ईंट-गारे में हम क्यों बने व्यर्थ में बेमन?
हम निकेतन, हम अनिकेतन

ठहरे अगर किसीके दर पर कुछ शरमाकर कुछ सकुचाकर
तो दरबान कह उठा, बाबा, आगे जो देखा कोई घर
हम रमता बनकर बिचरे पर हमें भिक्षु समझे जग के जन!
हम निकेतन, हम अनिकेतन

१ अगस्त २००५
वह हमेशा जागती रहती है
नदी की तरह
वह हमेशा खड़ी रहती है
पहाड़ की तरह
वह हमेशा चलती रहती है
हवा की तरह
वह अपने भीतर कभी
अपनी ऋतुऍं
नहीं देख पाती है
वह अपनी ही नदी में
कभी नही नहा पाती है
'ओरत' अपने ही स्‍वाद को
कभी नहीं चख पाती है।
---संकलित 

चंद्रकांत देवताले की कविता 

औरत


वह औरत 
आकाश पृथ्‍वी के बीच
कबसे कपड़े पछीट रही है?
पछीट रही है शताब्‍दियों से
धूप के तार पर सुखा रही है
वह औरत आकाश और धूप और हवा से
वंचित घुप्‍प की गुहा में
कितना आटा गूँथ रही है?
गूँथ रही है टनों आटा
असंख्‍य रोटियाँ
सूरज की पीठ पर पका रही है
एक औरत
दिशाओं के सूप में खेतों को 
फटक रही है
एक औरत
वक़्‍त की नदी में
दोपहर के पत्‍थर से
शताब्‍दियाँ हो गयीं 
एड़ी घिस रही है
एक औरत अनंत पृथ्‍वी को 
अपने स्‍तनों में समेटे
दूध के झरने बहा रही है
एक औरत अपने सिर पर
घास का गठ्‌ठर रखे
कबसे धरती को नापती ही जा रही है
एक औरत अँधेरे में
खर्राटे भरते हुए आदमी के पास 
निर्वसन जागती
शताब्‍दियों से सोयी है।
एक औरत का धड़
भीड़ में भटक रहा है
उसके हाथ अपना चेहरा ढूँढ रहे हैं
उसके पाँव 
जाने कब से सबसे
अपना पता पूछ रहे हैं।

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

★ श्री सम्मेत शिखर – एक महान तीर्थ ★


सम्मेत शिखर और शत्रुंजय तीर्थ भारतवर्ष के सम्पूर्ण जैन तीर्थों में प्रमुख हैं । पश्चिमी भारत के शिखर पर शत्रुंजय तीर्थ है और पूर्वी भारत में सम्मेत शिखर । किसी तीर्थकर के किसी एक कल्याणक से जब कोई भूमि तीर्थ बन जाया करती हैं, तब उस तीर्थ की पावनता और शक्ति का आकलन करना तो मानव बुद्धि के लिए असम्भव होगा, जहाँ बीस – बीस तीर्थंकरों ने निर्वाण की अखण्ड ज्योति जलाई हो । निर्वाण की पहली ज्योति अष्टापद में जली थी, जहाँ प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव भगवान निर्वाण को प्राप्त हुए थे, लेकिन आज हमारे लिए वह तीर्थ अदृश्य हैं । ऎसी स्थिति में सम्मेत शिखर वह तीर्थ हैं, जिसे ह्म निर्वाण की आदि ज्योति का शिखर कह सकते हैं । निर्वाण की सर्वोच्च ज्योति ही सम्मेत शिखर है । तीर्थकर ऋषभदेव, वासुपूज्य, नेमिनाथ और महावीर को छोडकर जैन धर्म के बीस तीर्थकरों ने यहाँ निर्वाण पद को प्राप्त किया ।
सम्मेत शिखर वह सशक्त स्थान है, जहाँ बीस बीस तीर्थकरों ने देहोत्सर्ग किया है । पर्वत शिखरों पर देहोत्सर्ग करने की जैनों में अपनी सिद्धान्त – सिद्ध परम्परा रही है । समाधि का यह रुप वास्तव में निरवद्द संल्लेखना है । प्रश्न स्वाभाविक है कि बीस बीस तीर्थकरों ने अपने देहोत्सर्ग एवं अन्तिम समाधि के लिए सम्मेत शिखर को ही क्यों चुना ? हर तीर्थकर ने अपनी चैतन्य विद्युत धारा से उस शिखर को चार्ज किया है । एक तीर्थकर ने वहाँ अपनी समाधि लगाई उनके हजारों वर्षों बाद हुए दूसरे तीर्थंकर और दूसरे के बाद तीसरे, यों पूरे बीस तीर्थकरों ने वहाँ निर्वाण प्राप्त किया । एक तीर्थकर की विद्युत धारा क्षीण होती, तब दूसरे तीर्थकर ने पुन: उसे अभिसंचित कर दिया । लाखों वर्षों से वह स्थान स्पन्दित, जागॄत और अभिसंचित होता रहा । चेतना कॊ ज्योति वहाँ सदा अखण्ड बनी रही । इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सम्मेत शिखर कितना अद्‍भूत, अनूठा, जागृत पुण्य क्षेत्र है ।
अरिहंतों का निर्वाण स्थल - निश्चित रुप से यह मानवजाति के लिए सौभाग्य की बात है कि उसे अपने आराध्य के निर्वाण स्थल, दर्शन – पूजन के लिए उपलब्ध है । सम्मेत शिखर कि महिमा का मूल कारण यहाँ के चन्दन के बगीचे, चमत्कारी भोमियाजी या पर्वत की ऊँचाई या तीर्थकर पुरुषों का विचरण ही नहीं हैं, क्योंकि यह सब कुछ तो अन्यत्र भी उपलब्ध हो सकता है । सम्मेत शिखर इसलिए महिमावंत है क्योंकि यहाँ एक नहीं बीस बीस तीर्थंकरों ने जीवन का चरम लक्ष्य – मोक्ष प्राप्त किया है । यह शिखर मात्र पत्थरों का समूह नहीं हैं अपितु आत्म – विजेता अरिहंतों के ज्योतिर्मय मदिंरों का समूह है । अष्टापद, चम्पापुरी, गिरनार या पावापुरी इस चार तीर्थों को छोडकर सम्पूर्ण विश्व में सम्मेत शिखर ही तो एक पावन धाम है जहाँ तीर्थकर आत्माओं ने निर्वाण प्राप्त किया है । सम्पूर्ण विश्व में किसी भी धर्म का कोई भी ऎसा तीर्थ नहीं जहाँ उस धर्म के बीस बीस आराध्य पुरुषॊं ने निएवाण प्राप्त किया हो । तीर्थकर आदिनाथ, वासुपूज्य स्वामी, नेमिनाथ भगवान और महावीर स्वामी को छॊडकर शेष बीस तीर्थकर – अजितनाथ, सम्भवनाथ, अभिनंदन स्वामी, सुमतिनाथ, पद्‍मप्रभु, सुपार्श्वनाथ, चन्द्रप्रभु, सुविधिनाथ, शीतलनाथ, श्रेयांसनाथ, विमलनाथ, अनंतनाथ, धर्मनाथ, शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरनाथ, मल्लिनाथ, मुनिसिव्रत स्वामी, नमिनाथ एवं पार्श्वनाथ भगवान ने यहाँ आकर जीवन की संध्या वेला पूर्ण की एवं परमपद मोक्ष प्राप्त किया ।
सम्मेत शिखर का शाब्दिक अर्थ - सम्मेत शिखर जा सीधा सा अर्थ है – ’समता का शिखर’, लेकिन इससे भी अधिक प्रभावशाली इसका अर्थ यह है कि समता के शिखर पुरुषों ने अपने श्रीचरणों का संस्पर्श कर जिसे पवित्र और पावन किया हो, समता के शिखर पुरुष जहाँ समवेत रुप में रहे हों, व्वह सम्मेत शिखर है । सम्मेत शिखर का प्राचीन नाम भी समवेत ही था । सम्मेत शब्द दो पदों से बना है – सम्म+एत । अर्थ हुआ, सम्यक् भाव को प्राप्त सुन्दर और प्रशक्त पर्वत । सम्मेत शिखर का सर्वाधिक प्राचीन उल्लेख ज्ञाताधर्म कथा नामक आगम के मल्लिजिन अध्ययन में हुआ है । वहाँ तीर्थकर मल्लिनाथ के निर्वाण का वर्णन करते हुए इस पर्वत के लिए दो शब्दों का प्रयोग किया गया है – ’सम्मेय पव्वए’ और ’सम्मेय सेल सिहरे’ । कल्पसूत्र के पार्श्वनाथ भगवान के चरित्र में तीर्थकर पार्श्व के निर्वाण का वर्णन करते हुए सम्मेत – शिखर के लिए ’सम्मेय सेल सिहरंमि’ शब्द अभिहित है । मध्यकालिन साहित्य में सम्मेत शिखर के लिए समिदिगिरि या समाधिगिरि नाम भी प्राप्त होता है । स्थानीय जनता इस पर्वत को पारसनाथ हिल नाम से सम्बोधित करती है । यह उल्लेखनीय है कि इस तीर्थ को श्वेताम्बर परम्परा में सम्मेत शिखर कहा जाता है और दिगम्बर परम्परा में सम्मेद शिखर कहा जाता है । इसका मुख्य कारण परम्परा भेद नहीं, अपितु प्राचीन भाषा के भेद का है । श्वेताम्बर परम्परा में अर्धमागधी प्राकृत प्रचलित है पुर दिगम्बर परम्परा में सौरसेनी । जैसा कि भाषाविद जानते हैं कि सौरसेनी प्राकृत में त का द प्रयोग हो जाता है । इसलिए दिगम्बर परम्परा में सम्मेत को सम्मेद कहा जाता है ।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

                                        अपनी बात 

हमारी सभ्यता ने, हमारे आधुनिक संसाधनों ने,हमारी आक्षाओं और स्वप्नों ने हमें एक निरीह भीड़ बना दिया|मनुष्य की विडम्बना ही यही है की भीड़ हो जाने  के बाद वह व्यवस्था की उपेक्षा का शिकार होता चला जाता है|
कोई भी भाषा, जब वह लोकप्रिय हो जाती है, तब वह सभी के लिए आदरणीय एवं ग्राह्य हो जाती है।

रविवार, 27 नवंबर 2016

अपनी बात

परित्यक्ता /तलाकशुदा, स्त्री का जीवन एक पुनरावलोकन

--शोभा जैन
जिस विषय में आज हम  बात करने का रहे है  उस विषय पर बात करना भारतीय परंपरा में कोई उचित नहीं समझता बल्कि इस विषय के पक्ष में बात रखने वाले को अक्सर गलत ही करार दिया जाता है विषय विवाह विच्छेद या तलाक । क्योंकि मनु के अनुसार कन्या एक बार ही दान दी जाती है।  किन्तु जैसे -जैसे समय बदल रहा है ज्ञान के विकास के साथ अपेक्षायें भी उतनी ही तीव्रता से अपना स्थान मजबूत कर रहीं हैं  वैसे ही  ये स्थितियां भी परिवर्तित हो गयी|  विवाह विच्छेद की इस प्रथा के चलते कई घर बर्बाद होने से बच भी गए है| इसलिए इसे कुप्रथा की श्रेणी में तो नहीं रखा जा सकता  ।प्राचीन काल में आधुनिक युग की विवाह विच्छेद की धारणा के समान  कोई व्यवस्था नहीं थी क्योंकि हिन्दू धर्म में विवाह एक ऐसा संस्कार था जिसमें आत्मा का आत्मा से ऐसा संबंध हो जाता था कि इस भौतिक हाड़-मांस के शरीर के नष्ट हो जाने के बाद भी संभवतः यह संबंध अटूट रहता था । यदि किन्हीं कारणों से पति अपनी पत्नी का त्याग कर देता था तो उसको उसके भरण-पोषण की व्यवस्था करनी पड़ती थी ।किन्तु आज शिक्षित समाज और बदलते परिवेश ने स्त्री और पुरुष दोनों का द्रष्टिकोण बदल दिया है विवाह के अर्थ में दोनों एक दूसरे की अपेक्षाओं पर परस्पर खरे उतरें यही इसका आधार है । हालाँकि कोई भी विवाह विच्छेद छोटे मोटे या पचा सकने वाले कारणों पर संभव नहीं।  निः संदेह इसके पीछे कोई एक नहीं बहुत से गंभीर कारण होते है जिसे समाज के हर एक व्यक्ति को समझाया नहीं जा सकता ।.. दुर्भाग्य की बात तो ये है की ये स्थिति कभी- कभी परिवार के सदस्य और रिश्ते नाते वाले भी नहीं समझते फिर समाज तो बहुत दूर है ।अक्सर तलाकशुदा महिला को ससुराल से बेदखल होने के बाद अपने मायके को भी छोड़ना होता है और किसी नयी जगह पर अपना गुजर बसर करना पड़ता है जहाँ उसके अतीत के बारे में कोई गलत टिप्पड़ी न कर सके जहाँ उसके अतीत से कोई परिचित ही न हो । क्योकि परित्यक्ता या तलाकशुदा महिलाओं को शिक्षित समाज में भी ज्यादातर लोगो के तिरस्कार, हीन भावना, असहयोग या दुरूपयोग होने का सामना करना पड़ता है कभी -कभी एसी महिलाओं को  चरित्रहीन बोलने से भी नहीं चूंकते  है ये शिक्षित समाज  के लोग । कभी कभी तो स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है की विवाह विच्छेद के बाद स्त्री का अकेले रहना अभिशाप बन जाता है |उसे यह कहकर मानसिक प्रताड़ना दी जाती है –जिसका एक पति नहीं उसे कई पति पैदा हो जाते है |या फिर उसे कुछ ऐसे समझोतों को स्वीकार करने पर विवश होना पड़ता है जिसके एवज में उसे अपने जीवन की सुरक्षा मिल सके| इसे मुझे स्पष्ट तौर पर लिखने की आवश्यकता नहीं | तलाकशुदा स्त्री के लिए सम्मान पाने की  ख्वाहिश रखना तो जैसे धरती पर स्वर्ग की अपेक्षा रखने के बराबर है | मैंने ये महसूस किया है की तलाकशुदा महिलाओं को अपने ही परिवार के मांगलिक कार्यों में दूर रखने के बहाने ढूंढे जाते है जैसे –अगर तलाक बड़ी बहन का हुआ है और छोटी बहन का वैवाहिक कार्यक्रम हो तो अक्सर उसे बाहर रहने की ही सलाह दी जाती है| इतना ही नहीं उसे साज श्रृंगार करने का भी हक नहीं उसे यह कहकर मानसिक प्रताड़ना दी जाती है की ये किसको दिखाने के लिए सज संवर रही है |
सोचने वाली बात ये है की क्या तलाकशुदा पुरुष का जीवन भी ऐसा ही होता है  विशेषतः उन परिस्थितियों में जब वैवाहिक जीवन में कोई संतान न हो |जिस प्रकार स्त्री भावनात्मक स्तर पर तहस महस हो जाती है तलाकशुदा होने की वजह से अपनी आत्मा को मार लेती है एक पुरुष के जीवन में क्या बदलाव आता है इस पर काम करना होगा क्या वो भी स्त्री की तरह प्रताड़ित जीवन जीता है? क्या उसे भी अपने जीवन में अनचाहे समझोतो के दौर से गुजरना पड़ता है? क्या उसकी मान प्रतिष्ठता को भी उसी तरह क्षति पहुँचती है जैसी स्त्री को ?क्या समाज उसे भी स्त्री की तरह एक आसामान्य पुरुष की नजरों से देखता है ?मेरे विचार में इस पर काम करने की जरूरत है|
 |ये जानना बेहद जरुरी है की परित्यक्ता /तलाकशुदा स्त्रियों का शेष जीवन केवल  प्रताड़ित होने के लिए ही बना है या पुरुष भी इस सामाजिक ओछेपन का शिकार होते है |
  साथ ही इस संवेदनहीनता का परिचय देने वाली प्रताड़ना  का स्थाई समाधान क्या है ? क़ानूनी रूप से स्त्री और पुरुष के जीवन की इस अवस्था के लिए उनकी विशेष सुरक्षा सम्मान के लिए कोई नियम या अधिकार बनाने की आवश्यकता है क्या?
   अलग से इसलिए क्योकि हमारा  समाज और समाज के बुद्धिजीवी  लोग  ही इन्हें सामान्य इंसान की तरह देखते ही नहीं | बेचारेपन की की आड़ में समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले ही उनके साथ एक ऐसे  व्यवहार का परिचय देते है जिससे उनकी मानवता पर भी संदेह होता है | ये केवल एक परित्यक्ता ही अपनी जुबान से बयां कर  सकती है |अंत में बस यही अपेक्षा समाज से  की स्त्री  को स्त्री  समझो |एक ओरत को  केवल दो ही चीजें चाहिए सुरक्षा और सम्मान | फिर चाहे वो कुंवारी हो, विवाहित हो या फिर तलाकशुदा |और एक स्त्री को स्त्री समझ लेना ही एक सभ्य और  शिक्षित समाज  होने का परिचायक है |
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सोमवार, 14 नवंबर 2016

                                                                       अपनी बात
                           ....................वृद्धाश्रम और युवा पीढ़ी एक पुनरावलोकन..........
                                                 ....................शोभा जैन...............................



कभी कभी कुछ उम्मीदों को छोड़ देना ही अंतिम विकल्प होता है विशेषतः तब जब उम्मीद अपने से उम्र और अनुभवों में किसी बड़े से हो,और तब भी जब उम्मीद अपने जीवन के लिए नहीं अपितु उनके जीवन को आसान बनाने के लिए कोई बेहतर सहयोग भरे परामर्श से जुडी हो |ऐसी उम्मीद को कभी -कभी अपने ह्रदय  को कठोर कर छोड़ देना ही अंतिम विकल्प होता है इसलिए नहीं की आप अब परवाह नहीं करते बल्कि इसलिए की वे बड़े खुद को लेकर चिंतनशील नहीं, बेपरवाह है वो शायद आपसे सहयोग तो लेना चाहते है किन्तु उनके परामर्शानुसार।  जो कहीं न कहीं पीढियों के मध्य नकारात्मकता के साथ गहरे  फांसले पैदा करने लगता है जिससे  समाज को ये सन्देश जाता है की बच्चे  सुनते नहीं या साथ नहीं देते| किन्तु वास्तविकता कुछ और ही होती है |दरअसल बच्चे माता -पिता की जिम्मेदारी उठाने को तत्पर रहते है किन्तु बड़ों को भी समयानुसार खुद को अपडेट कर बच्चों के साथ सामंजस्य स्थापित कर उन्हें उनके [माता -पिता ]जीवन के  निर्णय लेने की न सिर्फ स्वतंत्रता देनी चाहिए बल्कि उनके निर्णयों का सम्मान भी करना चाहिए |कहने का अर्थ बच्चों को सिर्फ अपनी जिम्मेदारी नहीं थोपे  बल्कि सहर्ष उन्हें निर्णय लेने के अधिकारों का भी हस्तांतरण करें तब शायद हमारे देश में वृद्धाश्रम की जरुरत ही महसूस न हो |दरअसल ऐसे मे दो ही स्थितियाँ हो सकती है या तो बच्चे भी अपने जीवन के संघर्ष के दौर से गुजर रहे होते है छोटी मोटी नोकरी से अपना घर खर्च चला रहे होते है और उन्हें इस संघर्ष  के साथ माता -पिता की जिम्मेदारी भी उठाना  है।
  या फिर  कभी -कभी बच्चे उस उम्र में अपने पिता से भी आगे निकल जाते है जिस उम्र में पिता शायद उतने सक्षम नहीं थे जितनी उनकी संतान।  निः संदेह इसका श्रेय उस  सन्तान के परिश्रम शिद्दत और जस्बे के साथ  माता -पिता को भी उतना ही जाता है। अब इन दोनों ही स्थितियों में माता -पिता को बच्चो की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन न हो इस बात को  ध्यान रखते हुए उनके साथ रहने की इच्छा रखनी चाहिए न की अपने हिसाब से उनके साथ  रहने की ख्वाहिश।  समय के साथ घर का मुखिया बदलता है किन्तु व्यक्ति के दर्जे  के साथ समय भी बदलता हैं माता -पिता इस भावनात्मक विचार को थोड़ा गहराई से लें और समझे तो  कोई भी पुत्र अपने माता -पिता को भला क्यों अपने साथ नहीं रखना चाहेगा। अपवादों की बात छोड़ दें,  फिर भी मेरा अनुभव यही कहता है वृद्धाश्रम में बुजुर्ग माता -पिता बच्चों के दुर्व्यवहार के चलते कम किन्तु अपनी खुद की कुछ आदतों और परिवर्तन को सहर्ष न स्वीकारने के चलते आते है। दुनियाँ का शायद ही ऐसा कोई युवा दंपत्ति होगा जो ये नहीं चाहता की वो अपने माता -पिता को अपनी उपलब्धियों का स्वाद चखाए और अपने बच्चों को दादा दादी की छत्र छाया में रखे जिससे वो हमारी परम्पराओं और संस्कारों को उसी रूप में समझ सके जिस रूप में वो है..  और ये कार्य घर के बड़े बुजुर्ग से बेहतर कोई नहीं कर सकता। भले ही  आर्थिक रूप से सक्षम हो या मध्यम वर्गीय संघर्षरत दंपत्ति, दोनों की ही सोच में ये बात किस स्ट्रीम लेवल  में जाकर  उपजती होगी की माता -पिता को साथ रखने से घर के खर्च बड़ जायेंगे अव्यवस्था बन जाएगी  दरअसल ये  सोच कमजोर आर्थिक स्थिति से कहीं अधिक माता -पिता के जिद्दी स्वभाव के चलते अधिक उपजती है किसी भी  संतान के मन में...  किन्तु दोष अक्सर युवा पीढ़ी को ही दिया जाता है की आज की युवा पीढ़ी माता -पिता को घर से वृद्धाश्रम भेज रही है किन्तु इसके मूल बिंदु और जड़ों पर कार्य करें तो कारण कुछ और भी हो सकते है अपवादों को छोड़ दें तो ।ये आलेख मैंने कुछ प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर लिखा है दुःख होता है जब माता -पिता बच्चों के साथ रहने की इच्छा से ज्यादा अपने मुताबित अपना जीवन बसर करने का दबाव उन पर बनाते है उनके निर्णयों में बार -बार हस्तक्षेप कर उनके मनोबल पर अंकुश लगाते है।या तो एक समझदार माता -पिता अपने बुढ़ापे की व्यवस्था इतनी मजबूत कर ले की उन्हें कभी भी अपनी संतान पर विशेषतः आर्थिक रूप से आश्रित  रहना ही ना पड़े फिर संतान से रिश्ते ता उम्र मधुर बने रहेंगे क्योकि अक्सर पैसा ही रिश्तों में फासले पैदा करता है।  या फिर अगर संतान के साथ रहने का सुख भोगना है तो समय के बदलाव के साथ अपनी आदतों में भी थोडा सा बदलाव बनता है और युवा पीढ़ी भी अपने माता -पिता के समर्पण का सम्मान करें क्योकि हो सकता है आपका पेट भरने के लिए माँ कई रातें  भूखी रही हो ये भी हो सकता है माता -पिता घर में मिठाई केवल इसलिए लाते थे की उनका बच्चा मिठाई क्या होती है ये समझ सके जबकि उन्होंने तो कभी उसका स्वाद चखा ही नहीं मैं ऐसे कई बुजुर्ग माता -पिता से परिचित हूँ जिन्होंने खुद कभी काजू बादाम नहीं चखा लेकिन अपने बच्चों को हर रोज बादाम भिंगोकर दी ताकि उनके बच्चे की आँखे लम्बे समय तक तंदरुस्त रह सके भले ही  उनकी आंखे जवाब दे चुकी हो... ये भी हो सकता है असंख्य पिता ने कभी दफ्तर से छुट्टी ही न ली हो केवल इसलिए की उनकी एक दिन की तनख्वा नहीं कट जाये... माँ ने कई रातें पिता की नाईट ड्यूटी और दिन सिलाई मशीन पर गुजारा हो पिता ने अपना सारा जीवन साईकल पर निकाला केवल इसलिए की उनका बेटा अच्छे कालेज में दाखिला ले सके उसकी ट्यूशन की फीस जुटाई जा सके वो एम.बी.ए.या इंजीनियरिंग कर सके ये सब शायद सिर्फ इसलिए की उनकी संतान वो सब कर पाये जो वो नहीं कर सके कम से कम एक मजदूर या श्रमिक बनने से उपर के सपने वो अपने बेटे के लिए देखता है और उन सपनों में माता -पिता स्वयं को जीते है ।कभी -कभी उनके हालात बयां करने लायक स्थिति में भी नहीं होते कभी माँ की हथेलियों की किसी ने देखा है चर्म से अधिक धारियां दिखाई देंगी जो शायद ये महसूस करवा दे की माँ ने तो कभी साबुन सोडा तेल इस्तेमाल ही नहीं किया..लेकिन मुझे दिया एक लम्बा चौड़ा बाथरूम नहाने के लिए जिसमें वो सारी  सुविधाएँ जिसका उन्हें शायाद ठीक तरह से इस्तेमाल करना ही नहीं आता जिसके बिना मेरा आज काम ही नहीं चलता ...
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मंगलवार, 8 नवंबर 2016

                                                                 अपनी बात 
                                                                 शोभा जैन 
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भारत सरकार ने  अपनी दूरदर्शिता का एक और अविस्मर्णीय परिचय दिया है 500 और 1000 के नोटों पर पाबन्दी लगाने का एतिहासिक फैसला करके काले धन पर लगाम लगाने और जाली नोटों के प्रसार पर पाबंदी लगाने का एक शानदार कदम उठाया है। पड़ोसी मुल्क 500 और 1000 के जाली नोट का इस्तेमाल कर  देश की अर्थव्यवस्था पर प्रहार कर रहे थे इन बड़े नोटों को बंद करने से टैक्स से बचने वालों, वित्तीय अपराधियों, आतंकियों के आर्थिक नेटवर्क और भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जा सकेगी। दरअसल ग्राहक भी खरीद का बिल न लेकर परोक्ष रूप से  काले धन को बढ़ावा दे रहे थे। इन पर रोक लगने से देश की अर्थव्यवस्था पारदर्शी होगी, सरकार के राजस्व में वृद्धि होगी और बाजार में तरलता आएगी चूँकि आम आदमी और हमारा श्रमिक वर्ग कालेधन जैसी समस्या से सीधे तौर पर इत्तेफाक नहीं रखता विशेषकर वो अशिक्षित वर्ग जो रोज रोटी के लिए अथक परिश्रम कर  अपनी छोटी सी जीविका साधन पर निर्भर रहते है उन्हें शायद आज ये बात थोड़ी असुविधाजनक प्रतीत हो किन्तु सरकार के इस कदम से भावी रणनीति के तहत सबसे ज्यादा लाभ जब उन्हें मिलेगा तब इस फैसले को ऐसा वर्ग सहजता से स्वीकार पायेगा ये एक ऐसा निर्णय है जिससे आम आदमी की कई आधारभूत समस्याओं का आने वाले समय में बड़ा समाधान निकल कर सामने आयेगा उनमें से एक मंहगाई है जिसकी मार से कोई भी अछूता नहीं । इस बात को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता की सरकार के इस फैसले से कई छोटी -छोटी प्यारी गुल्लकें प्रभावित होंगी किन्तु अक्सर वर्तमान में थोड़ी असुविधा बेहतर भविष्य के रास्ते भी खोलती है अतः समग्र रूप में सरकार के इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए।।।।

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शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

                                                                        अपनी बात
                                                                         शोभा जैन

अक्सर स्त्री को अपनी बौद्धिकता स्थापित करने में बहुत लम्बा संघर्ष करना पड़ता है |ये आधुनिक युग में नहीं अपितु वैदिक काल से ही होता चला आया है |इसके पीछे कारण इतना गहरा है की शायद इसे कोई भी स्त्री सहजता से स्वीकार ही न कर पाये खासतौर पर आज की शिक्षित नारी जिसके ज्ञान का विस्तार अपरिहार्य हो रहा है |एक स्त्री होते हुए भी मैं यही कहूँगी की कहीं  स्त्री  अपने भीतर अपने ही विकल्प तो नहीं खोज रही |गनीमत है की  खोज अभी स्त्री की  अपनी सीमाओं में है अभी तक एक  पुरुष के पास स्त्री का कोई विकल्प मौजूद  नहीं है | किन्तु जिस तरह, जिस गति से,जिस रूप में  स्त्री स्वयं को अब स्थापित कर रही है निः संदेह पुरुष को स्वयं को  स्त्री विहीन जीवन के लिए तैयार करना होगा दरअसल स्त्री की पुरुषों के साथ कन्धा से कन्धा मिलाकर चलने की दौड़ इतने तीव्र हो चुकी है की वो अब रुकना ही नहीं चाहती अपनी संवेदनाओं को दबा छुपा बहला फुसलाकर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहित है उसे घर गृहस्थी परिवार रिश्ते समर्पण से अब मोह नहीं वो आज की नारी है उसके लिए शायद शिक्षित होने की परिभाषा देहरी के बाहर होने के अर्थ में निहित है |शिक्षित नारी शायद घर की शोभा नहीं बन सकती वो किसी कंपनी में डायरेक्टर या फिर सी. ई. ओ. के पद पर ही अच्छी  लगती है इन्ही अर्थों में अग्रसर  रहा है नारी समाज |क्या अब वो स्त्री कभी नहीं मिल पायेगी जिसके प्रभाव के चलते पुरुष घर जल्दी आने को प्रयासरत रहता था |या फिर अपने मन की बात बताने को आतुर व्याकुल | क्या शिक्षित नारी संवेदनहीन हो गई है या फिर आज की नारी का  'अस्तित्व' ही उसके जीवन का केंद्र बन गया है जिसकी परिधि में पुरुष अकेला चक्कर काट रहा है |
                                                           अपनी बात
                                                             शोभा जैन
मनः स्थिति का हमारे जीवन में बहुत अहम स्थान होता है |कभी कभी हमारी मनः स्थिती हमें बेहद गंभीर होने जैसा आभास देती है जिसके तहत हम कभी कभी दूसरों की समस्याओं को समझने की कोशिश करते है या फिर संभव प्रयास करने का विचार करते है |कभी कभी हम पारिवारिक मतभेदों को भूलकर सबके प्रति प्रेम भाव महसूस करते है |या फिर कभी कभी सबसे दूर रहना या सबकुछ व्यर्थ सा प्रतीत होता है |दोनों ही स्थितियाँ मनः स्थिति पर निर्भर करती है |किन्तु ऐसे समय में कुछ बातों का लाभ अवश्य लेना चाहिए शायद उससे आपके भीतर की नकारात्मकता निराशा में कमी आ जाय |दरअसल ये मनः स्थिति कभी कभी किसी अच्छे माहोल की वजह से या फिर किसी की अच्छी बात से प्रेरित होकर या फिर किसी दूसरे को अच्छा करते देखकर हमारे भीतर जन्मती है ठीक इसके विपरीत मनः स्थिति का नकारात्मक होना भी माहोल,संगत और द्र्श्यगत अवस्था पर निर्भर करता है |किन्तु जब भी किसी के लिए कुछ अच्छा करने की मनः स्थिति बने या फिर कुछ भी रचनात्मक करने का मन करें तो फिर चाहे वो किसी ऐसे व्यक्ति से बात करने का हो जिससे कभी आपके व्यवहार खाराब हो गए हो या फिर खटास उत्पन्न हो गई है तो आपका वो अच्छा मुड आपके भीतर की सकारात्मकता में इजाफा कर आपको एक कदम और आगे बढ़ाएगा किसी अच्छे काम के लिए  |और सामने वाले के प्रति उदार व्यक्तित्व का भी उदाहरण प्रस्तुत करेगा |या फिर ऐसे समय में किसी ऐसे व्यक्ति की मदद करें जिसे आप अक्सर परेशानियों से घिरा देखते है किन्तु हर रोज उसे नजरअंदाज कर देते है अपनी स्वयं की समस्याओं के चलते |कभी -कभी आपका मुड आपेसे  वो करवा देता है जो आसामान्य आसाधारण होता है किन्तु लाभदायक |किन्तु जब आपकी मनः स्थित सबसे दूर रहने की महसूस हो रही हो या फिर सब कुछ व्यर्थ प्रतीत हो रहा है तो उस समय केवल एक ही कार्य करना उचित होगा की स्वयं पर संयम रख इस बात को बार -बार अपने भीतर धारण करें की आज आपकी मनः स्थिति ख़राब है नकारात्मक है आपसे कुछ भी गलत करवा सकती है इसलिए मुझे शांत रहना है कहने का तात्पर्य आपको कारण पता है की आपकी मनः स्थिति अभी सही नहीं है ऐसे में किसी भी प्रकार का संवाद या व्यवहार न करते हुए इसके बदलने के लिए प्रयास करने शुरू कर दें कुछ अच्छा पढ़े या फिर किसी ऐसे इंसान के साथ समय बिताएं जो आपकी मनः स्थिति की नकारात्मकता का प्रकोप भी शालीनता और शांति से वहन कर सके माता और पत्नी इसका अच्छा विकल्प हो सकते है इसके अतिरिक्त कोई करीबी मित्र जो आपकी कमियों से भी पूरी तरह वाकिफ हो जो आपको  चुपचाप सुन सके  |कभी कभी गुबार निकाल देने से भी इंसान हल्कापन महसूस करता है लेकिन निकले किस पर यही दुविधा है सबकी क्योकि अक्सर  ये विवाद या झगड़े का रूप ग्रहण कर लेता है इसलिए ऐसे इंसान का चुनाव बहुत सोच समझ कर करें |बहुत कम लोगो को ऐसे साथी नसीब होते है जो उनके प्रकोप का शिकार होने के लिए भी स्वयं को झोंक दे अब तो पत्नियाँ भी स्थिति का सामना करने में असफल साबित होने लगी है क्योकि वे खुद अपनी ही परेशानियों से बाहर नहीं आ पाती |पति महाशय को क्या सुनेगी और समझेगी |ज्ञान का विस्तार और स्वतंत्र  नारी की  आत्म निर्भरता के चलते अब पुरुष यह अपेक्षा शायद एक स्त्री से नहीं रख पा रहा है क्योकि स्त्री ने तो अब अपनी अलग सलग दुनियाँ बसानी शुरू कर दी है 'आज की शिक्षित नारी के नाम पर' | अब घर में ओरत मिलती ही नहीं है आज की नारी पुरुष से कंधे से कन्धा मिलाने वाली है |गलती से जो दिन भर घर में रहती है उनकी अपनी परेशानियों और शिकायतों की लिस्ट कभी कम ही नहीं होती शाम को घर आते आते वो खुद ही इतनी थक जाती है की पुरुष अपनी थकान में उसकी थकान महसूस करने लगता है उसकी मनः स्थिति को देखकर मुड को भापकर और फिर यही मनः स्थिति जब लम्बे समय तक चलती है तो आदमी बाहर तलाशता है अपने गुबार को बहार लाने के तरीके |स्त्री और पुरुष दोनों की ही अपनी अपनी मनः स्थिति समय समय पर बदलती है किन्तु इसका प्रबंधन दोनों ही अलग -अलग तरीके से करते है एक दूसरे के साथ नहीं कुछ बाहर जाकर |कुछ गलत तरीकों से गलत सोच को क्रियान्वित कर देते है |जबकि मनः स्थिति क्षणिक है स्थाई नहीं अच्छी और बुरी दोनों ही, किन्तु उसके प्रतिफल लम्बे समय तक चलने वाले होते है ये कभी न भूलें |












                                                  अपनी बात
                                                   शोभा जैन

कभी कभी हम अपनी मानसिकता के इस कदर शिकार हो जाते है की हम किसी दूसरे की बात को समझने की क्षमता ही खो देते है हम केवल वही सुनते है जो हम सुनना चाहते है भले ही वो अनुचित या अनुपयोगी हो |किन्तु किसी बात का वैचारिक सैलाब  कभी -कभी इस कदर मानसिकता पर हावी हो जाता है की सही को गलत और गलत को सही दिखाई देने लगता है |हम वही देखते है जो हम देखना चाहते है |अपनी शैल से बाहर आकर दूसरे पहलु से अवगत होना ही नहीं चाहते |अक्सर ऐसे लोगो को जिद्दी माना जाता है किन्तु जिद में अगर समझदारी या बुद्धिमानी हो तो काम की |जो आप सोचते हो या जो आपके विचारों में चलता है वही सही हो ये जरुरी नहीं |हमारे भीतर विचारों का सैलाब होता है हमकों उसमें से एक -एक लहर की परत खोलनी होती है फिर चिन्तन के योग्य विषयों का चुनाव करना पड़ता है सारे ही विचार चिन्तन का विषय नहीं होते |अक्सर विचारों में अधिक उलझने वाले सही और गलत का फर्क नहीं समझ पाते और हर उस सोच को जो उनके मन में चल रही होती है उसे ही पुख्ता सच समझकर निर्णय ले लेते है |कहने का तात्पर्य विचार तो अथाह हमारे दिमाग में आते है किन्तु चिन्तन का विषय हमें चुनना पड़ता है उस चिन्तन से फिर निष्कर्ष निकलकर सामने आना चाहिए विचारों से कभी भी निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता |
                                                                अपनी बात
                                                                शोभा जैन
जीवन में बहुत बार कुछ ऐसा घटित होता है जिसका आभास आपको पहले से ही  होता है की इसका परिणाम यही होगा |किन्तु उसे रोक पाना या विराम दे पाना आपके वश में नहीं होता फलस्वरूप आप कभी- कभी अपने आँखों के सामने वो होता देखते हो जो आप नहीं देखना चाहते थे |अक्सर कुछ पारिवारिक निर्णयों में प्रतिफल स्वरुप यही मिलता है तब जब कोई सही सलाह देने के साथ सहयोग भी देने को तत्पर है किन्तु सहयोग लेने वाला अपने उम्र, अनुभवों और स्वाभिमान के चलते सही होने के बावजूद भी उस निर्णय को बिना किसी संकोच स्वीकारने को तैयार नहीं| या फिर निर्णय को ओपचारिक तौर पर मानने को तो तैयार है[आदरस्वरुप सामने वाले की बात रखने के लिए ] किन्तु उसके क्रियान्वयन के [एग्ज्क्युशन ]समय उसमें अपना हस्तक्षेप निरंतर बनाये रखना या स्वतंत्र निर्णय नहीं लेने पर विवश करने जैसी स्थिति पैदा कर दी जाती है जिससे निर्णय और सहयोग देने वाला स्वतः ही पीछे हट जाता है या फिर स्वयं ही अपने  निर्णय को गलत करार दे देता है |कहने का तात्पर्य केवल इतना सा है की अगर आप किसी को कोई जिम्मेदारी सौंपते है तो फिर उसे स्वतंत्रता पूर्ण समय -समय पर निर्णय लेने के अधिकार भी देवे |केवल जिम्म्मेदारियाँ सौपने से 'कर्ता' को सिर्फ निराशा ही हाथ लगती है क्योकि उस जिम्मेदारी से जुड़े प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष छोटे छोटे और बड़े -बड़े अहम फैसलों के लिए वो किसी दूसरे निर्णायक पर निर्भर रहता है जो उसके मनोबल को कम करता है |साथ 'कर्ता' के मन में इस भाव को भी जन्म देता है की इतना ही दिमाग था पहले ही खुद कर लेते अब मैं कर रहा हूँ /रही हूँ / तो ऊँगली कर रहें है |अतः जिम्मेदारियों के साथ अधिकारों का भी हस्तांतरण  होंवे फिर उसमें हस्तक्षेप न करें अगर अपनी बात रखें भी तो केवल एक परामर्श के तौर पर उसे माना ही जायेगा इस अपेक्षा को अपने मस्तिष्क से निकाल फेंके अन्यथा कभी -कभी आप एक अच्छा  'सहयोगी' भी खो देते है  |

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

                                                             अपनी बात 
                                                            शोभा जैन
किसी भी प्रकार के परिवर्तन के लिए साधन कौन से अपनाये जा रहे है ये उस परिवर्तन का भविष्य और छवी दोनों का निर्धारण कर देता है |इंसान दो तरह का जीवन जीता है एक सामाजिक  दूसरा व्यक्तिगत | इसलिए परिवर्तन के लिए जो साधन वो व्यक्तिगत जीवन के लिए अपनाता है अक्सर सामाजिक जीवन में नहीं |चाहे फिर वो बात हिंसा और अहिंसा से भी क्यों न जुड़ी हो |

बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

 इंसान जैसा व्यवहार दूसरों के प्रति करता है, दूसरे भी उसी प्रकार उसके साथ व्यवहार  करते हैं।अपने व्यवहार के प्रति सजग और शब्दों के प्रति संयमित रहें।