लगातार टालते रहने से अक्सर निर्णय बदल जाते है। अप्रत्याशित बदले हुए निर्णयों को स्वीकारना बेहद दुष्कर होता है।अपनी मानसिकता को दोनों परिस्थितियों के लिए तैयार रखे जो परिणाम आप देखना चाहते है और जो नहीं देखना चाहते है फिर किसी के भी जीवन में कुछ अप्रत्याशित घटित ही नहीं होगा । हम सबके भीतर एक भीड़ छिपी होती है जो हमें कुरेदती है,पथविमुख करने को उतावली रहतीहै,अक्सर लोग निर्णायक की भूमिका निभाना चाहते है किन्तु परिणामों के लिए उनके पास कोई विकल्प नहीं---शोभाजैन Protected by Copyscape

बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

 इंसान जैसा व्यवहार दूसरों के प्रति करता है, दूसरे भी उसी प्रकार उसके साथ व्यवहार  करते हैं।अपने व्यवहार के प्रति सजग और शब्दों के प्रति संयमित रहें। 
जीवन की सच्चाईयों को भगवद गीता खुद में संजोए है. अगर  गीता के इन श्लोकों को अपने जीवन में उतार लें तो शायद  कभी असफ़लता का मुँह  न  देखना पड़े......
हर आदमी का जीवन बसर होता है
शोर से अधिक एकांत में असर होता है
भागता है हर पल वो सुकून की तलाश में
बस अपने से ही बेखबर होता है
कर बैठता है नादानियाँ किसी मौड़ पर
जिक्र उसका घर -घर होता है
उपलब्धियाँ वो नहीं दे पाती जो,
आलोचना में जो असर होता है
       -------शोभा जैन 

रविवार, 23 अक्टूबर 2016

जहाँ वृक्ष पर खिलते हैं नारी आकृति वाले 'नारीलता' फूल....

      इसकी सत्यता पर एक बार विचार अवश्य करें ..



प्रकृति के कई रंग हैं। कई बार प्रकृति कुछ ऐसे अजूबे भी उत्पन्न करती है कि उन पर विश्वास करना मुश्किल होता है, ठीक वैसे ही जैसे परियों की कहानियाँ। इसी प्रकार बचपन में हम अक्सर सुना करते थे कि गूलर का फूल होता है, पर वह रात्रि को खिलता है और उसे कोई देख नहीं सकता। इसी तर्ज पर ’गूलर का फूल’ होना जैसी एक कहावत भी है। जिसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब हमारा कोई परिचित एक लंबे समय बाद आँखों से ओझल रहने पर अचानक प्रकट होता है। ऐसी न जाने कितनी किंवदंतियाँ और बातें हैं, जिनके बारे में शत-प्रतिशत दावा करना मुश्किल होता है, पर यही तो हमारी उत्सुकता व रोचकता को बढ़ाते हैं। अक्सर अपने आस-पास हम पेड़-पौधों को तमाम देवी-देवताओं या जीवों की आकृति रूप में देखते हैं। हममें से कितनों ने कस्तूरी मृग देखे हैं, पर कस्तूरी खुशबू के बारे में अक्सर सुनते रहते हैं।

प्रकृति का एक ऐसा ही अजूबा है- ’नारीलता फूल’। नारी की सुदरता का बखान करने के लिए कई बार उसकी तुलना फूलों से की जाती है, पर यहाँ तो बकायदा नारी-आकृति फूल के रूप में पल्लवित-पुष्पित होती है। कहा जाता है कि यह एक दुर्लभ फूल है जो 20 साल के अंतराल पर खिलता है। यह भारत के हिमालय और श्रीलंका तथा थाईलैंड में पाए जाने वाले एक पेड़ में खिलता है। हिमालय में इसे इसके आकार के कारण नारीलता फूल कहा जाता है। जब यह फूल खिलता है तो पूरे पेड़ पर चारों तरफ नारी-आकृति वाले यह फूल लटके रहते हैं। ऐसा प्रतीत होता है, मानो किसी ने उन पेड़ों पर ढेर सारी गुडि़या लटका दी हों। वाकई नारी-आकृति वाला यह फूल दुर्लभ एवं प्रकृति की अनमोल कलाकारी है।


यही कारण है कि नारीलता फूल सदैव चर्चा में रहा है। यू-ट्यूब, फेसबुक और गूगल तक पर लोग इसके बारे में चर्चा कर रहे हैं और इसे खोज रहे हैं। कुछेक लोगों का तो ये भी मानना है कि यह किसी इंसान की हरकत है जिसने तमाम गुडि़यों को वृक्ष पर लटका दिया है, तो कुछेक इसे डिजिटल टेक्नालाजी से जोड़-तोड़ की कला बताते हैं। सच क्या है, यह किसी को नहीं पता। आखिर 20 साल का अंतराल कम नहीं होता है। पर जो भी हो प्रकृति की अद्भुत कलाकारी के हमने कई रंग देखे हैं और यह भी उसी में से एक हो तो आश्चर्य नहीं।

    जानकारी आकांशा यादव --शब्द शिखर 

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

जब तक "सत्य " घर से बाहर निकलता है.......!
तब तक " झूठ " आधी दुनिया घूम लेता है...!! 
आलेख -                
                  कितने मासूम ये दीये....

                              शोभा जैन


                                                       
                                                                                   
भारत का सबसे भव्य माने जाना वाला पर्व ‘दीपावली’ जिसकी भव्यता को पूर्णता देते हैं ये मिट्टी के  दिये | भारतीय संस्कृति की परम्पराओं में जिस तरह स्वास्तिक,कलश और शंख को महत्वपूर्ण माना गया है उसी तरह दीये भी इसी परंपरा का एक अहम हिस्सा हैं | ये मिट्टी के दीये भारतीय संस्कृति में हमें अपने जीवन से अज्ञान को दूर कर पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने का सन्देश भी देते हैं कितने मासूम होते होंगे वो हाथ, कितनी शिद्द्त होती होगी उनकों आकार देने वाले दोनों हाथों में जो प्रज्वलित होने पर इनकी शोभा चार गुनी बढ़ा देते है | पर जरुरी नहीं हमारे त्योहार को भव्य बनाने वाले इन हाथों के घर की दिवाली भी उतनी ही भव्य होती होगी |अब  इस बदलते परिवेश में इन जलते दीयों का रुदन सुनाई देने लगा है जिन दो हाथों के सामंजस्य से इन दीयों को आकार मिलता है वही दो हाथ इस तपती चिलचिलाती धूप में अपनी और इशारा कर बुलाते है एक सही खरीदार को उसी मासूमियत से जिस मासूमियत से इन्हें आकार में ढाला गया |दिये की  टोकरी में रखा प्रत्येक दिया टोकरी के बाहर झांक रहा है ताक रहा है दिवाली के भीड़ भरे बाजार में कि कोई  साहेबा बिना भाव ताव किये इस मासूम से बच्चे  को उसकी मासूमियत की कीमत दे जाय दीये की मासूमियत भी बिल्कुल वैसी ही जैसी उसे तपती धूप में बेचने वाली किशोरी  की  | लोग आते है भाव पूछकर चले जाते है उन पर तराशी गई मासूमियत से भरी बनावट और सुन्दरता, रंग रोगन का पारिश्रमिक भी उन्हें सही समय नहीं मिल पाता | कभी- कभी दिवाली आकर चली भी जाती है  और हाथ में रह जाती है महज़ कुछ चिल्लरें|  फिर भी दिये करते है इन्तजार अगली दिवाली का की हम इस टोकरी से बाहर आयेगे कोई साहेबा हम मे से किसी एक को अपने हाथ में लेकर उसी मासूमियत से देखेगी जिस मासूमियत से उन्हें बनाने वाले ने उन्हें अपनी  कल्पना में उकेरा था और उस कल्पना को साकार कर लाया इस बाज़ार में बेचने के लिए | दिये करते हैं इन्तजार आएगी कोई साहेबा और उठाकर देखेगी दिये के ढेर में एक साबुत से साफ़ सुधरे दीये को,  आजू बाजू घुमाकर उसे चारों और से देखेगी,  देखेगी उसकी बनावट को , उसकी उस गहराई को जिसमें तेल भरा जायेगा, ‘दिये’ की ‘गहराई’ निर्धारित करेगी वो अँधेरे में कब तक जलेगा , साहेबा देखेगी उसका तल, दिये का विस्तार, उसमें तराशी गई  चारों और सीडीनुमा कंगूरे वाली डिजाइन और वो सिरा जिसमें कपास की बत्ती निरंतर जलने के लिए अपना विराम लेगी केवल एक ही नहीं चार सिरे भी एक दिये में समा गए जिसमें चार बत्तियां एक साथ रोशन करेगी एक दिये को|  उन सिरों की गहराई इतनी सुंदर की बत्ती खुद ठहर कर जलने को आतुर हो जाय| है कोई ऐसा खरीदार इन मासूम दीयों का जो समझ सके इनका आकार ? बनावट? और विस्तार ? है कोई जो समझ सके  इनके सिरों में छिपी गहराई?  इसके तल में छिपी दृढ़ता,  इसके बनने से लेकर बाज़ार में  बिक जाने तक की व्यथा? कितने मासूम ये ‘दीये’ ढूँढ रहें  है किसी ऐसे खरीदार को| जो समझ सके इसके आकार प्रकार को |कितने मासूम ये ‘दिये’ |इन्हें जलाते नहीं है हम, ये तो अपनी ही आग में जलते है ‘कितने मासूम ये दिये’ |
                    अंत में किसी रचनाकार की कुछ पंक्तियाँ ----
अपना साया भी अंधेरों में साथ देता नहीं,
बनके साथ चलते है ये मिट्टी के दीये|
कभी आँगन,कभी मरघट,कभी समाधी पर,
किसी की याद में जलते है ये मिट्टी के दीये |
कितना स्वार्थी है जमाना  जलाता है इन्हें,
सिसकियाँ तक नहीं भरतें हैं ये मिट्टी के दीये |

……………………………………………………………………………………
जीवन बहुत रहस्यपूर्ण है और जो जल्दी अविचारपूर्वक निर्णय लेने के आदी हो जाते हैं, वे उसे जानने से वंचित ही रह जाते हैं।"—

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016


--ठन्डे आदमी की सोच 
         - शोभा जैन 




जब तक आपको यह ज्ञात न हो जाय की आप किस उद्द्देश्य की पूर्ति के  लिए बने  है तब तक सुकून से जीने की चेष्टा करना व्यर्थ है ..संक्षेप में कहें तो प्रतिपल आपको आत्मबोध होते रहना चाहिए ...क्योकि दुनियाँ का प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति के लिए बना है समय ईश्वर ने सबको एक समान दिया है उसकी उपयोगिता आपके भविष्य का निर्धारण करती है ...हमारा अतीत और वर्तमान दोनों का निचोड़ हमारा मार्गदर्शन करता है आपका कुछ भी किया व्यर्थ नहीं जाता बशर्ते उसका उपयोग खाद के रूप में किया जाय ..दुनियाँ के सारे ही लोग महान 'दार्शनिक' नहीं बन सकते किन्तु 'चिन्तन' की प्रवृत्ति इंसान को आत्मबोध के लिए प्रेरित करती है ...कोशिश इस बात के लिए की जानी चाहिए की हर रोज एक आम इंसान की तरह अन्न को पचाना है या अन्न से उर्जा का निर्माण करना है ....अपने विचार और कर्म के मध्य संतुलन सेतु में चिन्तन की अहम भूमिका होती है ...ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव रहा है चिन्तन फिर चाहे किसी छोटे से कार्य को प्रारंभ करने के पूर्व ही क्यों न किया गया हो जैसे -भले ही गृहणी का रोटी बेलना, करछी से सब्जी चालना या फिर लेखक का कलम से पहला शब्द लिखना ये तीनों ही कार्य एक चिंतनशील व्यक्ति बहुत सोच विचार कर करेगा जिसके परिणाम उसके कार्य में स्पष्ट झलकेंगे ये सत्य है विचार मंथन  कभी गलत परिणाम नहीं देगा ....अक्सर ऐसे लोगो को 'ठंडा इंसान' कहकर व्यंगात्मक रूप से संबोधन दिया जाता है क्योकि वो किसी भी कार्य की शुरुआत करने में इतना अधिक सोचते विचारते और निर्णय लेने में असीम धैर्य का परिचय भी देते है इस वजह से कई बार चीजें छूट भी जाती है ..अर्थात किसी चीज की शुरुआत ही नहीं हो पाती क्योकि  आम इंसान की भागने की प्रवृत्ति और शीघ्र हाथ का काम निबटाने की आदत उसे ऐसे चिंतक लोगो से स्वतः ही दूर कर देती है.....किन्तु किसी भी कार्य के समस्त पहलुओं पर विचार मंथन कर उसके परिणाम और दुष्परिणाम दोनों के लिए मानसिक तैयारी ही सफल व्यक्ति  का  परिचय बनती  है दरअसल ऐसे में मानव की स्थिति के हर पहलु को छूना होता है ...और मानसिक तैयारी वक़्त लेती है ...किसी भी कार्य को आज के द्रष्टिकोण से नहीं बल्कि भविष्य के नजरिये से तैयार करना ही दूरदर्शिता का परिचायक होता है अक्सर कुछ निर्णय  वर्तमान में ठेस पहुंचाते है  किन्तु एक सुद्रण भविष्य की नीव रख देते है...अतः इंसान को भविष्य को केंद्र में रखकर अपने वर्तमान की परिधि में  अपने निर्णयों और योजनाओं का क्रियान्वयन कर समाज में एक ठन्डे किन्तु बुद्धिमान शख्सियत की छवी के रूप में स्वयं को स्थापित करना चाहिए  जिससे दूसरे भी आपका अनुसरण कर सके .. हो सकता  है ऐसा करने से आप कई सुनहरे अवसरों से हाथ धो बैठे किन्तु जो हाथ लगेगा वो आजीवन आपके साथ होगा ,एक संतुष्टि और सुकून के साथ बिना किसी जोखिम के ..... [यहाँ युवाओं के लिए एक बात अवश्य लिखी जायेगी की अवसरों के पीछे नहीं भागे बल्कि स्वयं अवसर बनाये स्वनिर्मित अवसर आपके जीवन में  विरासत का काम करेंगे  वो विरासत जो आपने स्वयं बनाई है जो आज आपकी अमूल्य धरोहर होगी जिसे आप भावी पीढ़ी के हाथों सोंप सकेंगे ]
      इस आलेख में मेरे अपने व्यक्तिगत अनुभवों की भरमार है इसे लिखने में मैंने बेहद सुकून का अनुभव किया कारण एक मात्र की इसे लिखने से पहले जिया गया है इस जीने ने मेरा मनोबल बढाया फिर मुझे लगा क्यों न इस अनुभव को अपनों के साथ बांटा जाय शायद किसी के काम आ जाय .......
      साभार -

सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

कूड़े जैसे ढेर.....








भोजन की तलाश में गाँव से शहर आने वाले मजबूर लोग भीख में रोटी चावल की उम्मीद नहीं करते थे, वे भीख में बस चावलकी माड़ी मांगते थे। प्रेमेन्द्र लिखते हैं, 
'शहर की सड़कों पर देखें हैं,
 कुछ अजीब जीव/
बिल्कुल इंसानों जैसे/या,
 कि इंसानौं जैसे नहीं/
मानों उनके व्यंग्य चित्र, विद्रूप विकृत!/
फिर भी वे हिलते डुलते हैं बतियाते हैं, और
सड़क किनारे कूड़े जैसे ढेर बनाते हैं/
जूठन के कूड़ेदानों पर, बैठे हांफते/और माड़ी मांगते।'

रविवार, 9 अक्टूबर 2016

अच्छी किताबें,
और
अच्छे लोग
तुरंत समझ में नहीं आते,
उन्हें पढ़ना पड़ता है....

बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

मेहनत से उठा हूँ, मेहनत का दर्द जानता हूँ,
आसमाँ से ज्यादा जमीं की कद्र जानता हूँ।
लचीला पेड़ था जो झेल गया आँधिया,
मैं मगरूर दरख्तों का हश्र जानता हूँ।
छोटे से बडा बनना आसाँ नहीं होता,
जिन्दगी में कितना जरुरी है सब्र जानता हूँ।
मेहनत बढ़ी तो किस्मत भी बढ़ चली,
छालों में छिपी लकीरों का असर जानता हूँ।
कुछ पाया पर अपना कुछ नहीं माना,
क्योंकि आखिरी ठिकाना मेरा मिटटी का घर अपना जानता हूँ 
बेवक़्त, बेवजह, बेहिसाब मुस्कुरा देता हूँ,
आधे दुश्मनो को तो यूँ ही हरा देता हूँ!!

   ---- अज्ञात 
प्राप्त करना सहज है किन्तु उसे सहेजना बेहद कठिन ..

रविवार, 2 अक्टूबर 2016

हिंदी साहित्य में स्त्री आत्मकथाएँ सिर्फ व्यथा कथाएँ नहीं हैं बल्कि तमाम तरह की पितृसत्तात्मक चुनौतियों को स्वीकार करते हुए स्त्री के बनने की कथाएँ हैं। इस बनने के क्रम में बहुत कुछ जर्जर मान्यताएँ टूटती हैं लेकिन जो बनती है उसे या उसके अस्तित्व को पूरी दुनिया स्वीकार करती है।

रविवार, 25 सितंबर 2016





ज़िन्दगी के इस रण में 
खुद ही कृष्ण और 
खुद ही अर्जुन बनना
पड़ता है
रोज़ अपना ही सारथी 
बनकर जीवन की
महाभारत को लड़ना
पड़ता है ।

शुक्रवार, 16 सितंबर 2016



आलेख --'थर्ड जेंडर' सामाजिक अवधारणा एवं पुनरावलोकन पढ़ने के लिए क्लिक करें --
प्रभाकर श्रोत्रिय

प्रभाकर श्रोत्रिय की छवि
जन्मदिसम्बर 19, 1938 (आयु 78 वर्ष)
जावरा, मध्य प्रदेश, भारत
उपजीविकाहिन्दी साहित्यकार, आलोचक तथा नाटककार
भाषाहिन्दी
राष्ट्रीयताभारतीय






हिंदी के प्रसिद्ध सम्पादक/आलोचक/लेखक प्रभाकर श्रोत्रिय नहीं रहे। .वर्ष २०१५ सितम्बर माह में विश्व हिंदी सम्मेलन में विश्व स्तर पर सम्मानित होने वाले विश्वभर  के  ३४  साहित्यकारों में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले साहित्यकारों में से एक नाम डॉ॰ प्रभाकर श्रोत्रिय का भी था । प्रभाकरजी जी  का जन्म १९ दिसम्बर १९३८ (मध्यप्रदेश) के जावरा में हुआ।  वे   हिन्दी साहित्यकार, आलोचक तथा नाटककार थे ।इन्होंने अपनी उच्च शिक्षा विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से प्राप्त की और बाद में एम.ए. करने के बाद वहीं पर प्राध्यापक हो गए । इसके पश्चात इन्होंने पी.एच.डी. और डी.लिट्. की उपाधि भी वहीं से अर्जित की।   हिंदी आलोचना में प्रभाकर श्रोत्रिय एक महत्वपूर्ण नाम है पर आलोचना से परे भी साहित्य में उनका प्रमुख योगदान रहा , खासकर नाटकों के क्षेत्र में। उन्होंने कम नाटक लिखे पर जो भी लिखे उसने हिंदी नाटकों को नई दिशा दी। पूर्व में मध्यप्रदेश साहित्य परिषद के सचिव एवं 'साक्षात्कार' व 'अक्षरा' के संपादक रहे  एवं विगत सात वर्षों से भारतीय भाषा परिषद के निदेशक एवं 'वागर्थ' के संपादक पद पर कार्य करने के साथ-साथ वे भारतीय ज्ञानपीठ नई दिल्ली के निदेशक पद पर भी कार्य कर चुके हैं। वे अनेक महत्वपूर्ण संस्थानों के सदस्य रहे हैं।


प्रकाशित कृतियाँ


साहित्य के क्षेत्र में प्रभाकर श्रोत्रिय बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे । साहित्य की लगभग सभी विधाओं में इन्होंने सफलतापूर्वक लेखन कार्य किया । आलोचना, निबंध और नाटक के क्षेत्र में इनका योगदान विशेष उल्लेखनीय है।
  • आलोचना- 'सुमनः मनुष्य और स्रष्टा', 'प्रसाद को साहित्यः प्रेमतात्विक दृष्टि', 'कविता की तीसरी आँख', 'संवाद', 'कालयात्री है कविता', 'रचना एक यातना है', 'अतीत के हंसः मैथिलीशरण गुप्त', जयशंकर प्रसाद की प्रासंगिकता'. 'मेघदूतः एक अंतयात्रा, 'शमशेर बहादूर सिंह', 'मैं चलूँ कीर्ति-सी आगे-आगे', 'हिन्दी - कल आज और कल'
  • निबंध-'हिंदीः दशा और दिशा', 'सौंदर्य का तात्पर्य', 'समय का विवेक', 'समय समाज साहित्य'
  • नाटक- 'इला', 'साँच कहूँ तो. . .', 'फिर से जहाँपनाह'।
  • प्रमुख संपादित पुस्तकें- 'हिंदी कविता की प्रगतिशील भूमिका', 'सूरदासः भक्ति कविता का एक उत्सव प्रेमचंदः आज', 'रामविलास शर्मा- व्यक्ति और कवि', 'धर्मवीर भारतीः व्यक्ति और कवि', 'समय मैं कविता', 'भारतीय श्रेष्ठ एकाकी (दो खंड), कबीर दासः विविध आयाम, इक्कीसवीं शती का भविष्य नाटक 'इला' के मराठी एवं बांग्ला अनुवाद तथा 'कविता की तीसरी आँख' का अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित।
इसके अलावा साहित्यिक जगत उन्हें प्रखर सम्पादक के रूप में भी जानता है। वे ‘वागर्थ’, साक्षात्कार‘ और ‘अक्षरा’ जैसी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं के लंबे समय तक संपादक रहे । भारतीय ज्ञानपीठकी पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ के वे लंबे समय तक संपादक रहे ।

पुरस्कार और सम्मान


  • अखिल भारतीय आचार्य रामचंद्र शुक्ल पुरस्कार (उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान),
  • आचार्य नंददुलारे वाचपेयी पुरस्कार (मध्य प्रदेश साहित्य परिषद),
  • अखिल भारतीय केडिया पुरस्कार,
  • समय शिखर सम्मान (कान्हा लोकोत्सव, 1991),
  • श्रेष्ठ कला आचार्य (मनुवन, भोपाल, 1989),
  • अखिल भारतीय रामवृक्ष बेनीपुरी पुरस्कार (बिहार सरकार),
  • अखिल भारतीय श्री शारदा सम्मान (म.प्र. के हि.सा. एवं संस्कृतिन्यास देवरिया) एवं
  • माधव राव सप्रे पत्र संग्रहालय का रामेश्वर गुरु साहित्यिक पत्रकारिता पुरस्कार।
  • मित्र मंदिर कोलकाता सम्मान 1998,
  • सारस्वत सम्मान 2002 ।

  • विशेष --उपरोक्त जानकारी संग्रहण अथवा विकिपीडिया से उधृत है 

    शुक्रवार, 19 अगस्त 2016


    आलेख --

    रक्षाबंधन -वर्तमान परिप्रेक्ष्य में एक पुनरावलोकन 

                                         
    भारत त्योहारों का देश है। कहा जाता है प्राचीनकाल में रक्षाबंधन मुख्यत: ब्राह्मणों का, विजयदशमी क्षत्रियों, दीपावली वैश्यों और होली शूद्रों का त्यौहार माना जाता था। रक्षाबंधन के पर्व पर यह आलेख इस त्यौहार के अर्थपूर्ण निर्वहन पर एक पुनरवलोकन है। रक्षाबंधन के  त्यौहार पर  प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन ब्राह्मण अपने यजमानों के दाहिने हाथ पर एक सूत्र बांधते थे, जिसे रक्षासूत्र कहा जाता था।
    येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबल:।
    तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे  रक्षे मा चल मा चल।।
    इस श्लोक का हिन्दी भावार्थ है- "जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बाँधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बाँधता हूँ। हे रक्षे (राखी)! तुम अडिग रहना (तू अपने संकल्प से कभी भी विचलित न हो।)" भविष्यपुराण के अनुसार इन्द्राणी द्वारा निर्मित रक्षासूत्र को देवगुरु बृहस्पति ने इन्द्र के हाथों बांधते हुए इस मन्त्र का  स्वस्तिवाचन किया था (यह श्लोक रक्षाबन्धन का अभीष्ट मन्त्र है) रक्षाबंधन जिसे एक त्यौहार के रूप में हम मनाते है इसे मनाये जाने के पीछे कई मान्यताएं रहीं है इसके  संबंध में एक  पौराणिक कथा भी प्रसिद्ध है। देवों और दानवों के युद्ध में जब देवता हारने लगे, तब वे देवराज इंद्र के पास गए। देवताओं को भयभीत देखकर इंद्राणी ने उनके हाथों में रक्षासूत्र बाँध दिया। इससे देवताओं का आत्मविश्वास बढ़ा और उन्होंने दानवों पर विजय प्राप्त की। तभी से राखी बाँधने की प्रथा शुरू हुई। दूसरी मान्यता के अनुसार ऋषि-मुनियों के उपदेश की पूर्णाहुति इसी दिन होती थी। वे राजाओं के हाथों में रक्षासूत्र बाँधते थे। इसलिए आज भी इस दिन ब्राह्मण अपने यजमानों को राखी बाँधते हैं।रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के पवित्र प्रेम का भी प्रतीक है। यह सबसे अहम  कारण रक्षा बंधन के दिन को बहुमूल्य बनाता है। हालांकि कई अन्य मान्यतायें और कथाएँ रक्षा बंधन के सन्दर्भ में प्रचलित है और राखी के इन धागों में  अनेक कुरबानियाँ निहित  हैं।अंततः  इस पर्व का सार 'रक्षा सूत्र' के रूप में ही उभर कर आता है। शायद इसीलिए  रक्षाबंधन का त्योहार हर भाई को बहन के प्रति अपने कर्तव्य की याद दिलाता है।किन्तु उत्सवों और त्योहारों को मनाने का मूल कारण अब महज एक दिवस की ओपचारिकता जैसी प्रतीत होती है शायद हम इस बात को भूल गए हैं कि राखी के धागों का संबंध मन की पवित्र भावनाओं से हैं।एक पुरुष को ईश्वर ने स्त्री के रक्षक के स्वरुप में ही निर्मित किया है समयानुसार उसके पद और स्थान में बदलाव किया किन्तु स्त्री को सदैव पुरुष का संरक्षण सस्मान प्राप्त हो इसलिए ही पिता, भाई और पति के रूप में स्त्री के जीवन में एक पुरुष को अनिवार्य किया। हालांकि अब समय इतना तेजी से  आगे निकल रहा है की आज की नारी स्वयं को पुरुष तुल्य बनाने में स्वयं को सक्षम कर रही है। किन्तु समय कितना भी आगे निकल जाय कुछ चीजें कभी नहीं बदलती ईश्वर ने अगर स्त्री और पुरुष को दो अलग -अलग स्वरुप में निर्मित किया है तो अवश्य ही इसके पीछे कोई ठोस कारण रहा होगा। स्त्री को समर्पण के साथ मानसिक सहयोग के लिए पुरुष के जीवन में होना अनिवार्य किया। समयानुसार  पद और स्थान का बदलाव कर एक पुरुष को भी  माता के रूप में, बहन के रूप में और पत्नी के रूप में स्त्री अनिवार्य की गयी। इसका अर्थ जो कार्य स्त्री का है वो शायद उससे बेहतर कोई नहीं कर सकता और जो कार्य एक पुरुष का है वो कार्य उससे बेहतर कोई नहीं कर सकता किन्तु आज प्रकृति के नियमों के साथ थोड़ी छेड़-छाड़  हो रही है स्त्री और पुरुष दोनों ही अपने -अपने काम को दरकिनार कर कर्तव्यविमुख हो रहें है। सभ्यता और परिवेश के विकास के साथ प्रकृति द्वारा प्रदत्त नेमत का भी ससम्मान निर्वहन करना अनिवार्य है। अन्यथा किसी भी  विकास का चरम पतन का कारण भी बन जाता है। घर- गृहस्थी,साज श्रृंगार सेवा पूजा संस्कार जैसी बातें एक स्त्री के पिछड़ेपन का घोतक मानी जाने लगी है.। किन्तु नोकरी करने वाली स्त्री सेल्फ और आत्मविश्वासी औरत के रूप में संबोधित होने लगी है एसी महिलाओं को रक्षक की जरुरत ही महसूस नहीं होती शायद इसलिए क्योकि जो रक्षा करेगा उसकी भी अपनी अपेक्षायें होंगी जो निः संदेह एक पुरुष की एक स्त्री से होती है पदानुसार माँ,बहन,और पत्नी के रूप में।  उन्हें पूरा करने के लिए उसे अपने पारिवारिक जीवन में स्वयं को  डुबोना  होगा। घर के हर एक सदस्य की जरूरतों खुशियों का ख्याल रखना होगा ये काम शायद बाहर जाकर पैसा कमाने से भी कठिन है क्योकि ये काम शिद्दत और समर्पण मांगता है। जिसे देने के लिए शायद आज की शिक्षित नारी तैयार नहीं। बाहर जाकर काम करना कोई गलत काम नहीं किन्तु अपनी जिम्मेदारियों के सम्पूर्ण निर्वहन के पश्चात् ही इस और अग्रसर होने का  कदम बढ़ाना एक उचित निर्णय होगा। बल्कि अपने शोक या स्वयं को रचनात्मक बनाए रखने के लिए ऐसा कोई भी कार्य करना बिल्कुल सही निर्णय होगा। किन्तु स्त्री की आर्थिक आत्मनिर्भरता का अतिरेक कई परिवारों में विघटन का कारण बन रहा है। फलस्वरूप आज की स्त्री घर में रहना ही नहीं चाहती।  घर के कार्यो की दक्षता उसे गर्वित महसूस नहीं कराती। जबकि उसके पास एक पुरुष है जो उसे आर्थिक रूप से भी सुरक्षित संरक्षित कर सम्मान की जिन्दगी देने में सक्षम है। इस विषय का मूल थोडा गहरा है की रक्षा सूत्र तभी बांधना या बंधवाना उचित होगा जब दोनों एक दूसरे के कर्तव्यों  का निर्वहन कर सकें। फिर वो भाई का बहन के साथ ही क्यों न हो। अगर भाई रक्षा करने के लिए तत्पर है तो बहन भी समर्पण के लिए स्वयं को सक्षम बनायें।पदानुरूप एक पुरुष से  एक स्त्री  की  अपने जीवन में दो ही अनिवार्य आवश्यकता होती है संरक्षण[सुरक्षा] और सम्मान। बिना पुरुष के ये दोनों ही आवश्यकतायें पूरी नहीं होगी या  संभव नहीं ऐसा लिखकर मैं  किसी के विचारों या स्वाभिमान को ठेस न पहुचाते हुए प्रकृति के सत्य से अवगत करने का प्रयास अवश्य करुँगी की कोई तो वजह रही होगी ईश्वर ने स्त्री और पुरुष दोनों को पृथक रूप में निर्मित किया न केवल शारीरिक अपितु मानसिक तौर पर भी। मैं यहाँ उनके विचारों से भी सहमत हूँ जो स्त्री को 'आज की नारी से' संबोधित करते है मैं मानती हूँ भारत देश में कई वीरांगनायें जन्मी है जिन्होंने पुरुषों के समान साहसिक कार्य  किये हैं किन्तु उनकी वीरता युद्ध के साथ उनके प्रेम और समर्पण की भी गाथा कहती है।और समानुसार उन्होंने स्वयं को केवल 'पत्नी' बने रहना भी स्वीकारा।  जिसमें उनकी प्रतिभा एक बेहतर  माँ,पत्नी और बहु के साथ -साथ एक कुशल रानी के रूप में भी उभर कर सामने आयी।  अतः इस रक्षाबन्धन रक्षा सूत्र का अर्थ गहराई से समझकर स्त्री भी इस रक्षा सूत्र की कीमत देने के लिए तत्पर रहे। रक्षाबंधन केवल एक पर्व ही नहीं अपितु  सामाजिक और पारिवारिक एकबद्धता एवं एकसूत्रता एवं हमारी  सांस्कृतिक विरासत को पुनर्सृजित करने का एक अवसर है. एक ऐसा पर्व जो घर -घर मानवीय रिश्तों में उर्जा का संचार कर दे। नारी के सम्मान और सुरक्षा पर केन्द्रित ये पर्व विलक्षण इसी लिए है क्योकि सबसे अधिक जिम्मेदारी से परिपूरित है। प्राचीन काल में जब शिष्य गुरुकुल से अपनी शिक्षा पूरी कर अपने गुरु से विदा लेते थे तब आचार्य का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए वे रक्षा सूत्र बांधते थे जबकि आचार्य अपने विधार्थी को इस कामना के साथ रक्षा सूत्र बांधते थे की उसने जो ज्ञान प्राप्त किया है उसका वह अपने भावी जीवन में समुचित ढंग से प्रयोग करेंगे अर्थात् दोनों की एक दुसरे के प्रति अपेक्षायें निहित है। वर्तमान समय मानवीय संवेदना और मानवीय उसूलों से परे  केवल साज श्रृंगार के साथ भाईयों की जेब की इतिश्री करने से ज्यादा और कुछ नहीं।



    रक्षाबंधन -वर्तमान परिप्रेक्ष्य में एक पुनरावलोकन 
    भारत त्योहारों का देश है। कहा जाता है प्राचीनकाल में रक्षाबंधन मुख्यत: ब्राह्मणों का, विजयदशमी क्षत्रियों, दीपावली वैश्यों और होली शूद्रों का त्यौहार माना जाता था। रक्षाबंधन के पर्व पर यह आलेख इस त्यौहार के अर्थपूर्ण निर्वहन पर एक पुनरवलोकन है। रक्षाबंधन के  त्यौहार पर  प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन ब्राह्मण अपने यजमानों के दाहिने हाथ पर एक सूत्र बांधते थे, जिसे रक्षासूत्र कहा जाता था।
    येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबल:।
    तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे  रक्षे मा चल मा चल।।
    इस श्लोक का हिन्दी भावार्थ है- "जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बाँधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बाँधता हूँ। हे रक्षे (राखी)! तुम अडिग रहना (तू अपने संकल्प से कभी भी विचलित न हो।)" भविष्यपुराण के अनुसार इन्द्राणी द्वारा निर्मित रक्षासूत्र को देवगुरु बृहस्पति ने इन्द्र के हाथों बांधते हुए इस मन्त्र का  स्वस्तिवाचन किया था (यह श्लोक रक्षाबन्धन का अभीष्ट मन्त्र है) रक्षाबंधन जिसे एक त्यौहार के रूप में हम मनाते है इसे मनाये जाने के पीछे कई मान्यताएं रहीं है इसके  संबंध में एक  पौराणिक कथा भी प्रसिद्ध है। देवों और दानवों के युद्ध में जब देवता हारने लगे, तब वे देवराज इंद्र के पास गए। देवताओं को भयभीत देखकर इंद्राणी ने उनके हाथों में रक्षासूत्र बाँध दिया। इससे देवताओं का आत्मविश्वास बढ़ा और उन्होंने दानवों पर विजय प्राप्त की। तभी से राखी बाँधने की प्रथा शुरू हुई। दूसरी मान्यता के अनुसार ऋषि-मुनियों के उपदेश की पूर्णाहुति इसी दिन होती थी। वे राजाओं के हाथों में रक्षासूत्र बाँधते थे। इसलिए आज भी इस दिन ब्राह्मण अपने यजमानों को राखी बाँधते हैं।रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के पवित्र प्रेम का भी प्रतीक है। यह सबसे अहम  कारण रक्षा बंधन के दिन को बहुमूल्य बनाता है। हालांकि कई अन्य मान्यतायें और कथाएँ रक्षा बंधन के सन्दर्भ में प्रचलित है और राखी के इन धागों में  अनेक कुरबानियाँ निहित  हैं।अंततः  इस पर्व का सार 'रक्षा सूत्र' के रूप में ही उभर कर आता है। शायद इसीलिए  रक्षाबंधन का त्योहार हर भाई को बहन के प्रति अपने कर्तव्य की याद दिलाता है।किन्तु उत्सवों और त्योहारों को मनाने का मूल कारण अब महज एक दिवस की ओपचारिकता जैसी प्रतीत होती है शायद हम इस बात को भूल गए हैं कि राखी के धागों का संबंध मन की पवित्र भावनाओं से हैं।एक पुरुष को ईश्वर ने स्त्री के रक्षक के स्वरुप में ही निर्मित किया है समयानुसार उसके पद और स्थान में बदलाव किया किन्तु स्त्री को सदैव पुरुष का संरक्षण सस्मान प्राप्त हो इसलिए ही पिता, भाई और पति के रूप में स्त्री के जीवन में एक पुरुष को अनिवार्य किया। हालांकि अब समय इतना तेजी से  आगे निकल रहा है की आज की नारी स्वयं को पुरुष तुल्य बनाने में स्वयं को सक्षम कर रही है। किन्तु समय कितना भी आगे निकल जाय कुछ चीजें कभी नहीं बदलती ईश्वर ने अगर स्त्री और पुरुष को दो अलग -अलग स्वरुप में निर्मित किया है तो अवश्य ही इसके पीछे कोई ठोस कारण रहा होगा। स्त्री को समर्पण के साथ मानसिक सहयोग के लिए पुरुष के जीवन में होना अनिवार्य किया। समयानुसार  पद और स्थान का बदलाव कर एक पुरुष को भी  माता के रूप में, बहन के रूप में और पत्नी के रूप में स्त्री अनिवार्य की गयी। इसका अर्थ जो कार्य स्त्री का है वो शायद उससे बेहतर कोई नहीं कर सकता और जो कार्य एक पुरुष का है वो कार्य उससे बेहतर कोई नहीं कर सकता किन्तु आज प्रकृति के नियमों के साथ थोड़ी छेड़-छाड़  हो रही है स्त्री और पुरुष दोनों ही अपने -अपने काम को दरकिनार कर कर्तव्यविमुख हो रहें है। सभ्यता और परिवेश के विकास के साथ प्रकृति द्वारा प्रदत्त नेमत का भी ससम्मान निर्वहन करना अनिवार्य है। अन्यथा किसी भी  विकास का चरम पतन का कारण भी बन जाता है। घर- गृहस्थी,साज श्रृंगार सेवा पूजा संस्कार जैसी बातें एक स्त्री के पिछड़ेपन का घोतक मानी जाने लगी है.। किन्तु नोकरी करने वाली स्त्री सेल्फ और आत्मविश्वासी औरत के रूप में संबोधित होने लगी है एसी महिलाओं को रक्षक की जरुरत ही महसूस नहीं होती शायद इसलिए क्योकि जो रक्षा करेगा उसकी भी अपनी अपेक्षायें होंगी जो निः संदेह एक पुरुष की एक स्त्री से होती है पदानुसार माँ,बहन,और पत्नी के रूप में।  उन्हें पूरा करने के लिए उसे अपने पारिवारिक जीवन में स्वयं को  डुबोना  होगा। घर के हर एक सदस्य की जरूरतों खुशियों का ख्याल रखना होगा ये काम शायद बाहर जाकर पैसा कमाने से भी कठिन है क्योकि ये काम शिद्दत और समर्पण मांगता है। जिसे देने के लिए शायद आज की शिक्षित नारी तैयार नहीं। बाहर जाकर काम करना कोई गलत काम नहीं किन्तु अपनी जिम्मेदारियों के सम्पूर्ण निर्वहन के पश्चात् ही इस और अग्रसर होने का  कदम बढ़ाना एक उचित निर्णय होगा। बल्कि अपने शोक या स्वयं को रचनात्मक बनाए रखने के लिए ऐसा कोई भी कार्य करना बिल्कुल सही निर्णय होगा। किन्तु स्त्री की आर्थिक आत्मनिर्भरता का अतिरेक कई परिवारों में विघटन का कारण बन रहा है। फलस्वरूप आज की स्त्री घर में रहना ही नहीं चाहती।  घर के कार्यो की दक्षता उसे गर्वित महसूस नहीं कराती। जबकि उसके पास एक पुरुष है जो उसे आर्थिक रूप से भी सुरक्षित संरक्षित कर सम्मान की जिन्दगी देने में सक्षम है। इस विषय का मूल थोडा गहरा है की रक्षा सूत्र तभी बांधना या बंधवाना उचित होगा जब दोनों एक दूसरे के कर्तव्यों  का निर्वहन कर सकें। फिर वो भाई का बहन के साथ ही क्यों न हो। अगर भाई रक्षा करने के लिए तत्पर है तो बहन भी समर्पण के लिए स्वयं को सक्षम बनायें।पदानुरूप एक पुरुष से  एक स्त्री  की  अपने जीवन में दो ही अनिवार्य आवश्यकता होती है संरक्षण[सुरक्षा] और सम्मान। बिना पुरुष के ये दोनों ही आवश्यकतायें पूरी नहीं होगी या  संभव नहीं ऐसा लिखकर मैं  किसी के विचारों या स्वाभिमान को ठेस न पहुचाते हुए प्रकृति के सत्य से अवगत करने का प्रयास अवश्य करुँगी की कोई तो वजह रही होगी ईश्वर ने स्त्री और पुरुष दोनों को पृथक रूप में निर्मित किया न केवल शारीरिक अपितु मानसिक तौर पर भी। मैं यहाँ उनके विचारों से भी सहमत हूँ जो स्त्री को 'आज की नारी से' संबोधित करते है मैं मानती हूँ भारत देश में कई वीरांगनायें जन्मी है जिन्होंने पुरुषों के समान साहसिक कार्य  किये हैं किन्तु उनकी वीरता युद्ध के साथ उनके प्रेम और समर्पण की भी गाथा कहती है।और समानुसार उन्होंने स्वयं को केवल 'पत्नी' बने रहना भी स्वीकारा।  जिसमें उनकी प्रतिभा एक बेहतर  माँ,पत्नी और बहु के साथ -साथ एक कुशल रानी के रूप में भी उभर कर सामने आयी।  अतः इस रक्षाबन्धन रक्षा सूत्र का अर्थ गहराई से समझकर स्त्री भी इस रक्षा सूत्र की कीमत देने के लिए तत्पर रहे। रक्षाबंधन केवल एक पर्व ही नहीं अपितु  सामाजिक और पारिवारिक एकबद्धता एवं एकसूत्रता एवं हमारी  सांस्कृतिक विरासत को पुनर्सृजित करने का एक अवसर है. एक ऐसा पर्व जो घर -घर मानवीय रिश्तों में उर्जा का संचार कर दे। नारी के सम्मान और सुरक्षा पर केन्द्रित ये पर्व विलक्षण इसी लिए है क्योकि सबसे अधिक जिम्मेदारी से परिपूरित है। प्राचीन काल में जब शिष्य गुरुकुल से अपनी शिक्षा पूरी कर अपने गुरु से विदा लेते थे तब आचार्य का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए वे रक्षा सूत्र बांधते थे जबकि आचार्य अपने विधार्थी को इस कामना के साथ रक्षा सूत्र बांधते थे की उसने जो ज्ञान प्राप्त किया है उसका वह अपने भावी जीवन में समुचित ढंग से प्रयोग करेंगे अर्थात् दोनों की एक दुसरे के प्रति अपेक्षायें निहित है। वर्तमान समय मानवीय संवेदना और मानवीय उसूलों से परे  केवल साज श्रृंगार के साथ भाईयों की जेब की इतिश्री करने से ज्यादा और कुछ नहीं।


    मंगलवार, 16 अगस्त 2016







    हम सभी के जीवन से हर रोज गुजरती  कुछ पंक्तियाँ।  रिश्तों और संबंधों के गिरते स्तर, तनाव,  अलगाव के अहम कारणों पर प्रश्न वाचक शैली में संदेशात्मक किसी लेखक की ये पंक्तियाँ  ----मैं रूठा, तुम भी रूठ गए फिर मनाएगा कौन ? आज दरार है, कल खाई होगी फिर भरेगा कौन ? मैं चुप, तुम भी चुप इस चुप्पी को फिर तोडेगा कौन ?...