कोई भी कालखंड अपनी संवेदनशीलता अगले कालखंड मे नहीं पहुंचाता। वह बस अपनी संवेदना की बौद्धिकता को वहाँ पहुंचाता है। संवेदना के माध्यम से हम हम रहते हैं जबकि बौद्धिकता हमें कोई और बनाती है। बौद्धिकता हमें बिखेरती है और यह इसीलिए है कि जो हमें बिखेरता है, वही हमारे बाद बचता है। हर युग अपने उत्तराधिकारी को वह देता है जो उसके पास नहीं था।
लगातार टालते रहने से अक्सर निर्णय बदल जाते है। अप्रत्याशित बदले हुए निर्णयों को स्वीकारना बेहद दुष्कर होता है।अपनी मानसिकता को दोनों परिस्थितियों के लिए तैयार रखे जो परिणाम आप देखना चाहते है और जो नहीं देखना चाहते है फिर किसी के भी जीवन में कुछ अप्रत्याशित घटित ही नहीं होगा । हम सबके भीतर एक भीड़ छिपी होती है जो हमें कुरेदती है,पथविमुख करने को उतावली रहतीहै,अक्सर लोग निर्णायक की भूमिका निभाना चाहते है किन्तु परिणामों के लिए उनके पास कोई विकल्प नहीं---शोभाजैन
रविवार, 6 मई 2018
बुधवार, 25 अप्रैल 2018
शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018
गुरुवार, 19 अप्रैल 2018
कुछ प्रश्न वर्तमान पीढ़ी के जहन में----सम्बंधित है भविष्य से ----शायद अभिभावकों के कुछ काम आ जाए-----
१-प्रेम को लेकर असहज है समाज!
२-विवाह के फैसले पर असमंजस में युवा!
३-देख – भांप कर चुने जीवनसाथी
४-अंतरजातीय विवाह करेंया न करें
५-विवाह कीसफलता के पूर्व आंकलन मुल्यांकन का पेरामीटर क्या
६-कोई भी निर्णय पीढ़ियों में संवाद, ना बन जाय विवाद
७- अविवाहित रहने केक्या परिणाम[स्त्री औरपुरुष दोनों के]
८-लिव इन रिलेशनशीप कहाँ तक कारगर साबित
९ -जीवन के इस अहम निर्णय लेने की योग्यता का क्या पेरामीटर-उम्र,अनुभव,परिपक्वता,या कोई घटना अथवा परम्परा
१०-उपरोक्त फैसले समाज को ध्यान में रखकर ले या अपने वर्तमान औरभावी जीवन को
२-विवाह के फैसले पर असमंजस में युवा!
३-देख – भांप कर चुने जीवनसाथी
४-अंतरजातीय विवाह करेंया न करें
५-विवाह कीसफलता के पूर्व आंकलन मुल्यांकन का पेरामीटर क्या
६-कोई भी निर्णय पीढ़ियों में संवाद, ना बन जाय विवाद
७- अविवाहित रहने केक्या परिणाम[स्त्री औरपुरुष दोनों के]
८-लिव इन रिलेशनशीप कहाँ तक कारगर साबित
९ -जीवन के इस अहम निर्णय लेने की योग्यता का क्या पेरामीटर-उम्र,अनुभव,परिपक्वता,या कोई घटना अथवा परम्परा
१०-उपरोक्त फैसले समाज को ध्यान में रखकर ले या अपने वर्तमान औरभावी जीवन को
उपरोक्त के चलते प्रेम और विवाहित संबंधों के नए प्रतिमानों की न सिर्फ खोज हो रही है, बल्कि उन पर नए परीक्षण भी हो रहे हैं। यह दीगर है कि इससे पीढ़ियों में संघर्ष और तनाव उभरने लगा है।------ शोभा जैन
समय के साथ- साथ हमारी किन चीजों का विकास हो रहा है इसका पुनरावलोकन होते रहना चाहिए कभी- कभीं सिर्फ शरीर का विकास होता है बुद्धि का नहीं, उम्र का विकास होता है अनुभव का नहीं, डिग्रियों की लम्बी कतारे किन्तु ज्ञान का नाम नहीं, विचारों के आडम्बर बहुत किन्तु उनमे तर्क नहीं, जीवन बहुत जीने को पर अनुशासन नहीं, आधा अधूरा विकास नहीं कहलाता 'संतुलित विकास' का पुनरावलोकन अवश्य होना चाहिए| कहने का अर्थ समयानुसार स्वयं को अपडेट करते रहना | क्योकि मेरा ऐसा मानना है ---'समय- असमय अपने भीतर से कुछ घटाना कुछ बढ़ाना अति आवश्यक हो जाता है |' शोभा जैन
हम 'जरूरतों' से अधिक इच्छाओं में जीते है और सबसे अधिक दुखी भी 'इच्छाओं' की वजह से होते है| इस स्रष्टि में ऐसे इंसान बिरले ही होते है जिनकी जरूरतें बहुत सिमित होती है औरसुविधाओं के होने के बावजूद वह अपनी महज सिमित जरूरतों में सदैव संतुष्ट रहते है यही संतुष्टि उनकी स्थाई ख़ुशी का कारण बन जाती है |संक्षेप में--- सुख सुविधाये होने के बावजूद उनका उपभोग न करके स्वयं को संतुष्ट रखना एक बहुत बड़ी उपलब्धि होने के साथ किसी के उत्कृष्ट व्यक्तित्व होने का परिचायक भी है इसे थोडा गहराई से समझे 'इच्छा' और 'जरूरतों' के फर्क को समझना बेहद आवश्यक है | ---शोभा जैन
दुनिया में काम करने के लिए आदमी को अपने ही भीतर मरना पड़ता है. आदमी इस दुनिया में सिर्फ़ ख़ुश होने नहीं आया है. वह ऐसे ही ईमानदार बनने को भी नहीं आया है. वह पूरी मानवता के लिए महान चीज़ें बनाने के लिए आया है. वह उदारता प्राप्त करने को आया है. वह उस बेहूदगी को पार करने आया है जिस में ज़्यादातर लोगों का अस्तित्व घिसटता रहता है..
.- (विन्सेन्ट वान गॉग की जीवनी- 'लस्ट फ़ॉर लाइफ़' से)
सफ़र की हद है वहाँ तक कि कुछ निशान रहे|
चले चलो के जहाँ तक ये आसमान रहे|
चले चलो के जहाँ तक ये आसमान रहे|
ये क्या उठाये क़दम और आ गई मन्ज़िल
मज़ा तो जब है के पैरों में कुछ थकान रहे|
मज़ा तो जब है के पैरों में कुछ थकान रहे|
वो शख़्स मुझ को कोई जालसाज़ लगता है
तुम उस को दोस्त समझते हो फिर भी ध्यान रहे|
तुम उस को दोस्त समझते हो फिर भी ध्यान रहे|
मुझे ज़मीं की गहराईयों ने दाब लिया
मैं चाहता था मेरे सर पे आसमान रहे|
मैं चाहता था मेरे सर पे आसमान रहे|
मगर सितारों की फसलें उगा सका न कोई
मेरी ज़मीन पे कितने ही आसमान रहे|
मेरी ज़मीन पे कितने ही आसमान रहे|
वो एक सवाल है फिर उस का सामना होगा
दुआ करो कि सलामत मेरी ज़बान रहे|
दुआ करो कि सलामत मेरी ज़बान रहे|
राहत...........
बुधवार, 18 अप्रैल 2018
सारा क्रोध केवल फेसबुक या ट्विटर पर उकेरने के लिए ही होता है या हमारे समाज प्रेमी मित्र जमीनी लड़ाई भी लड़ रहे है |क्योकि अब तो बेटियों के बलात्कार की खबरे अखबार में छपने वाले हर दिन के राशी फल के जैसी हो गई है |इसकी वजह केवल और केवल आक्रोश का तमाशा करना ढोल पीटना है |जबकि जमीनी लड़ाई के लिए किसी के भी पास समय नहीं सब अपनी दिनचर्या सवारने में लगे है |कुछ तो चिलचिलाती जला देने वाली धूप होने की वजह से घर बाहर नहीं निकल सकते उनका राष्ट्र प्रेम ठंडी छत के नीचे कूलर या एसी के बिना बाहर नहीं आ सकता | बेटियों को संवेदना के परिणाम चाहिए कोरी देश भक्ति नहीं | उन बेटियों की जिनके साथ एसी कोई भी घटना हुई है उनकी तस्वीरे शेयर करने से अच्छा है जिन्होंने ये घिनोने कुकृत्य किये है उनकी तस्वीरे तलाशे शेयर करें |अक्सर हम उन बातों पर ही ध्यान देते है जो हमें करना है जो हमें नहीं करना है उसकी सूची हम कम ही बनाते है |शोभा जैन
सोमवार, 5 मार्च 2018
‘एक आश्रय से दूसरे में आकर,
मैं एक बंधन से मुक्त हो जाता हूँ
यह मेरी मुक्ति है |
बार –बार एक दास्ता से दूसरी में कम या ज्यादा
आजाद होते हुए उतनी देर में मैं बना लूँ एक दुनियाँ अपने भीतर और अपने बाहर तक पहुँचा दूँ ताकि नष्ट न हो |
और जब दोबारा एक बार घर बदलूँ ,
वह दुनियाँ मेरी कुछ बड़ी हो गई हो|’’
---रघुवीर सहाय
मैं एक बंधन से मुक्त हो जाता हूँ
यह मेरी मुक्ति है |
बार –बार एक दास्ता से दूसरी में कम या ज्यादा
आजाद होते हुए उतनी देर में मैं बना लूँ एक दुनियाँ अपने भीतर और अपने बाहर तक पहुँचा दूँ ताकि नष्ट न हो |
और जब दोबारा एक बार घर बदलूँ ,
वह दुनियाँ मेरी कुछ बड़ी हो गई हो|’’
---रघुवीर सहाय
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