हम प्रति क्षण दो समानान्तर जीवन जी रहे होते हैं – एक, जो हमारे बाहर दुनियावी कोलाहल बनकर तैर रहा है, दूसरा – जो हमारे भीतर कुलबुला रहा होता है। जब इन दोनों जीवनों के मध्य असमंजस की लहरें उफान लेने लगती हैं, तो सहन करने की एक निश्चित सीमा के उपरान्त विद्रोह का अंकुर फूटता है। इस अंकुर से फूटता है जीवन का वास्तविक अर्थ और स्वयं के अस्तित्व का कारण।
लगातार टालते रहने से अक्सर निर्णय बदल जाते है। अप्रत्याशित बदले हुए निर्णयों को स्वीकारना बेहद दुष्कर होता है।अपनी मानसिकता को दोनों परिस्थितियों के लिए तैयार रखे जो परिणाम आप देखना चाहते है और जो नहीं देखना चाहते है फिर किसी के भी जीवन में कुछ अप्रत्याशित घटित ही नहीं होगा । हम सबके भीतर एक भीड़ छिपी होती है जो हमें कुरेदती है,पथविमुख करने को उतावली रहतीहै,अक्सर लोग निर्णायक की भूमिका निभाना चाहते है किन्तु परिणामों के लिए उनके पास कोई विकल्प नहीं---शोभाजैन
शुक्रवार, 22 जुलाई 2016
बुधवार, 6 जुलाई 2016
द्रोपदी शस्त्र उठा लो, अब गोविंद ना आयंगे
छोडो मेहँदी खडक संभालो, खुद ही अपना चीर बचा लो
द्यूत बिछाये बैठे शकुनि, मस्तक सब बिक जायेंगे
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो,अब गोविंद ना आयेंगे |
कब तक आस लगाओगी तुम, बिक़े हुए अखबारों से,
कैसी रक्षा मांग रही हो दुशासन दरबारों से
स्वयं जो लज्जा हीन पड़े हैं वे क्या लाज बचायेंगे
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो अब गोविंद ना आयेंगे |
कल तक केवल अँधा राजा,अब गूंगा बहरा भी है
होठ सील दिए हैं जनता के, कानों पर पहरा भी है
तुम ही कहो ये अश्रु तुम्हारे, किसको क्या समझायेंगे?
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो,अब गोविंद ना आयेंगे |
-अनाम
छोडो मेहँदी खडक संभालो, खुद ही अपना चीर बचा लो
द्यूत बिछाये बैठे शकुनि, मस्तक सब बिक जायेंगे
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो,अब गोविंद ना आयेंगे |
कब तक आस लगाओगी तुम, बिक़े हुए अखबारों से,
कैसी रक्षा मांग रही हो दुशासन दरबारों से
स्वयं जो लज्जा हीन पड़े हैं वे क्या लाज बचायेंगे
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो अब गोविंद ना आयेंगे |
कल तक केवल अँधा राजा,अब गूंगा बहरा भी है
होठ सील दिए हैं जनता के, कानों पर पहरा भी है
तुम ही कहो ये अश्रु तुम्हारे, किसको क्या समझायेंगे?
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो,अब गोविंद ना आयेंगे |
-अनाम
शनिवार, 2 जुलाई 2016
विवाहेत्तर प्रेम और परिणाम
शादीशुदा पुरुष ,बाल बच्चों के साथ अपना पारिवारिक जीवन जीने वाले पुरुष से प्रेम भारतीय परंपरा में नयी बात नहीं है,इसके पीछे के कारण या तो बहुत गहरे होते है या फिर उपरी तौर पर व्यावसायिक। हम यहाँ जेन्युन प्रेम की बात कर रहें है जो विवाहेत्तर प्रेम के अंतर्गत आतां है या तो दोनों ही शादी शुदा होते है अपने जीवन के साथ या फिर कोई एक तलाक शुदा अथवा अकेला। इस प्रेम की मांगे भी नई नहीं हैं,ये भी पुरानी हैं, इस तरह के आख्यान भरे पड़े हैं।सवाल यह है कि प्रेमीयुगल प्रेम के अलावा क्या करते हैं ? क्या प्रेम उन्हें घर में अपनी पत्नी से नसीब नहीं होता या फिर पत्नी के साथ अधिकारों का वजन आपसी समझ को निरंतर हल्का करता जाता है जिसके तहत पुरुष समय के साथ -साथ वैवाहिक होकर भी एकाकी ही रहता है ऐसा एकाकीपन जो दिखाई नहीं देता। प्रेम का जितना महत्व है उससे ज्यादा प्रेमेतर कार्य-व्यापार का महत्व है। किन्तु ऐसे प्रेम अक्सर बीच राह में ही दम तौड देते है। क्योकि प्रेम की शुरुआत व्यक्तिगत हो सकती है किन्तु उसको स्थायित्व पाने के लिए सामाजिक सशक्तिकरण की आवश्यकता होती है उस प्रेम को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर उसकी सामाजिक क्षमता में संवर्द्धन ही उसकी सफलता का परिचायक बनता है अन्यथा प्रेम का बीज पनपना आसान है पोषण के साथ विकसित होना दुर्लभ। प्रेम में निवेश वही कर सकता है जो सामाजिक उत्पादन भी करता हो, प्रेम सामाजिक होता है, व्यक्तिगत नहीं। प्रेम के सामाजिक भाव में निवेश के लिए सामाजिक उत्पादन अथवा सामाजिक क्षमता बढ़ाने की जरूरत होती है। इससे प्रेम परंपरागत दायरों को तोड़कर आगे चला जाता है। पुरानी नायिकाएं प्रेम करती थीं, और उसके अलावा उनकी कोई भूमिका नहीं होती थी। प्रेम तब ही पुख्ता बनता है, अतिक्रमण करता है जब उसमें सामाजिक निवेश बढ़ाते हैं। व्यक्ति को सामाजिक उत्पादक बनाते हैं। प्रेम में सामाजिक निवेश बढ़ाने का अर्थ है प्रेम करने वाले की सामाजिक भूमिकाओं का विस्तार और विकास। समाज से दूर रहकर नहीं उनके बीच रहकर उसे स्थायित्व प्रदान करना प्रेम पैदा करता है, पैदा करने के लिए निवेश जरूरी है, आप निवेश तब ही कर पाएंगे जब पैदा करेंगे। प्रेम में उत्पादन तब ही होता है जब व्यक्ति सामाजिक तौर पर उत्पादन करे। सामाजिक उत्पादन के अभाव में प्रेम बचता नहीं है, प्रेम सूख जाता है। प्रेम के जिस रूप से हम परिचित हैं उसमें समर्पण को हमने महान बनाया है। यह प्रेम की पुंसवादी धारणा है। प्रेम को समर्पण नहीं शिरकत की जरूरत होती है। प्रेम पाने का नहीं देने का नाम है।अगर पुरुष सामाजिक रूप से प्रेम को सशक्त बनाता है तो स्त्री को भी पूर्ण समर्पण भाव से उस सशक्तिकरण को सहेज कर रखना जरुरी है विवाहेत्तर प्रेम की भी मर्यादायें होती है उसे ओपन इंडेड समझ कर न तो उसे निभाया जा सकता है न आगे बढाया जा सकता है। केवल समर्पण और लेने के भाव पर टिका प्रेम इकतरफा होता है। इसमें शोषण का भाव है। यह प्रेम की मालिक और गुलाम वाली अवस्था है। इसमें शोषक-शोषित का संबंध निहित है। दरअसल प्रेम कोई उधाधि या पदवी नहीं केवल एक अनुभूति के बलबूते जीता है और जीवित रहता है उसे अधिकारों की आवश्यकता नहीं न ही किसी पद की वो केवल एक दुसरे के खूबसूरत साथ से भी जीवित रह सकता है बशर्ते आधारभूत आवश्यकतायें पूरी हो, अँधा प्रेम चार दिन का ही होता है, पुरुष सम्मान और सुरक्षा के लिए आधिकारिक रूप से उत्तरदायी न होकर भी दायित्व को समझे और ह्रदय से निभाये।और स्त्री उसके जीवन का स्रजन कर उसे सुकून दे। एक पुरुष को एक स्त्री से केवल सुकून की ही अपेक्षा हो सकती है..... इस प्रेम को समाज में अक्सर स्वीकार नहीं जाता किन्तु कुछ चीजें नियति पर निर्भर करती है जो मनुष्य के समझ से परे सही गलत से उपर होती है शायद इसीलिए आज विवाहेतर प्रेम संबंधो के आंकड़ों में तीव्र गति से इजाफा हुआ किन्तु ये इजाफा केवल प्रेम सम्बन्ध बनने के आंकड़े है चल कितना पाए और खड़े कितने रहे उनकी संख्या इक्की दुक्की ही है। किन्तु कुछ मिसाल भी बनते है जिन पर 'बाजी राव मस्तानी' जैसी फ़िल्में बनती है वो ऐसे ही एक प्रेम का प्रचलित प्रासंगिक उदाहरण है ..मिसाल बनने के लिए तपना होता है ...जीवन भर का साथ सुकून भरा बिना अधिकारों के किसी के साथ जीना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। इसे केवल एक प्रेम करने वाला और अपने प्रेम में अपने आप के साथ संघर्षरत जीवन जीने वाला ही महसूस कर सकता है। सामाजिक द्रष्टि से भले ही उसे दूसरी पत्नी का नाम दिया जाय किन्तु सच तो ये है की वो किसी भी पद का मोहताज नहीं कोई अधिकार उसे निभाने के लिए आवश्यक नहीं वो तो मुक्त जीता है। प्रतीक्षा में की कब मिलेंगे अपनी -अपनी जिम्मेदारियों के चलते अपने लिए जीने एक साथ एक ही छत के नीचे एक ऐसे आत्मविश्वास के साथ जो शायद अब पति -पत्नी के रिश्ते में भी दिखाई नहीं देता। दिखाई देती है तो बस जिम्मेदारी जिसे निभाने के लिए दो युगल एक ही छत के नीचे एक ही कमरे में अपने चन्द्रमा को आधा और पूरा होते देखते है। ठीक इसके विपरीत एक जीवन उस रिश्ते के साथ जो वास्तव में युगल नहीं, ना ही बिताते है रात एक कमरे में, किसी अर्द्ध और पूर्ण चन्द्र के मध्य। वो तो जीते है पूरा जीवन पूर्ण सूरज के उगने और पूर्ण सूरज के ढलने में। आधा कुछ भी नहीं सबकुछ सम्पूर्ण किन्तु समाज की नजर में अपूर्णता का शिकार। वो समाज जिसके पास न तो अपना सूरज है न अपना आधा चंदा सिर्फ वो डूबे है दूसरे की दे ले में। किन्तु ऐसे प्रेम को जीने वाले खुश है क्योकि उन्हें चाहिए सिर्फ साथ एक दुसरे का।मुट्ठी भर समय भी उन्हें इतना कुछ दे जाता है की बहुत पाने की ख्वाहिश नहीं रहती। बिना अधिकारों के अधिकार निभाना बिना बंधन अपने आप को दायरों में बांधना ही इस प्रेम की विजय का परिचायक होता है। दरअसल विवाहेत्तर जीवन में प्रेम होना सामान्य बात हो गई किन्तु सफल परिणामों तक पहुँच पाना दुष्कर ..दरअसल सत्यता के साथ के आभाव में छद्म प्रेम ज्यादा दिनों नहीं चल नहीं पाता अंततः पुरुष को पत्नी और प्रेमिका में से किसी एक का चुनाव करना ही पड़ता है ये एक ऐसा प्रेम जिसे उजागर करने पर भी नहीं चल पाता बस इन दोनों ही परिस्थितियों बीच से सुरक्षित होकर गुजरना ही इसके सफल परिणामों का कारण बन सकता है।और इन परिस्थितियों से सफलतापूर्वक गुजरना आपकी जरूरत पर निर्भर करता है की ये प्रेम आपकी 'जरूरत' है या फिर कुछ समय का आकर्षण या कुछ ख़राब हालातों की उपज ... आपके जीवन में किसी के आने से आपके जीवन के हालात सुधर जाये ये जरुरी नहीं किन्तु आप संभल जाय ये संभव हो सकता है... जो आपको समझ कर संभाल सके वो सशक्त विवेकी और समझदार इंसान आपकी जरूरत बन सकता है जिसके साथ बात करके आप हल्का महसूस करें वही साथी हर इंसान को अपने जीवन में चाहिए होता है और जिसकी उपस्थिति प्रेम के रूप में भी किसी के जीवन में हो सकती है..और प्रेम के रूप में ही हो ये भी जरुरी नहीं यह रिश्ता भाई ,बहन, माँ या फिर किसी मित्र के साथ भी बन सकता है ...क्योकि इसकी महती आवश्यकता परिवार की परिधि होती है और केंद्र में आप इस रिश्ते को रखकर परिधि में अपने परिवार को लेकर चलेंगे तभी इस रिश्ते के उद्दात्त स्वरुप को बचाया जा सकता है ....अन्यथा अपनी जरूरतों के लिए परिवार के सुखों की तिलांजलि देना आपके स्वार्थी होने का परिचायक माना जायेगा ....
शादीशुदा पुरुष ,बाल बच्चों के साथ अपना पारिवारिक जीवन जीने वाले पुरुष से प्रेम भारतीय परंपरा में नयी बात नहीं है,इसके पीछे के कारण या तो बहुत गहरे होते है या फिर उपरी तौर पर व्यावसायिक। हम यहाँ जेन्युन प्रेम की बात कर रहें है जो विवाहेत्तर प्रेम के अंतर्गत आतां है या तो दोनों ही शादी शुदा होते है अपने जीवन के साथ या फिर कोई एक तलाक शुदा अथवा अकेला। इस प्रेम की मांगे भी नई नहीं हैं,ये भी पुरानी हैं, इस तरह के आख्यान भरे पड़े हैं।सवाल यह है कि प्रेमीयुगल प्रेम के अलावा क्या करते हैं ? क्या प्रेम उन्हें घर में अपनी पत्नी से नसीब नहीं होता या फिर पत्नी के साथ अधिकारों का वजन आपसी समझ को निरंतर हल्का करता जाता है जिसके तहत पुरुष समय के साथ -साथ वैवाहिक होकर भी एकाकी ही रहता है ऐसा एकाकीपन जो दिखाई नहीं देता। प्रेम का जितना महत्व है उससे ज्यादा प्रेमेतर कार्य-व्यापार का महत्व है। किन्तु ऐसे प्रेम अक्सर बीच राह में ही दम तौड देते है। क्योकि प्रेम की शुरुआत व्यक्तिगत हो सकती है किन्तु उसको स्थायित्व पाने के लिए सामाजिक सशक्तिकरण की आवश्यकता होती है उस प्रेम को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर उसकी सामाजिक क्षमता में संवर्द्धन ही उसकी सफलता का परिचायक बनता है अन्यथा प्रेम का बीज पनपना आसान है पोषण के साथ विकसित होना दुर्लभ। प्रेम में निवेश वही कर सकता है जो सामाजिक उत्पादन भी करता हो, प्रेम सामाजिक होता है, व्यक्तिगत नहीं। प्रेम के सामाजिक भाव में निवेश के लिए सामाजिक उत्पादन अथवा सामाजिक क्षमता बढ़ाने की जरूरत होती है। इससे प्रेम परंपरागत दायरों को तोड़कर आगे चला जाता है। पुरानी नायिकाएं प्रेम करती थीं, और उसके अलावा उनकी कोई भूमिका नहीं होती थी। प्रेम तब ही पुख्ता बनता है, अतिक्रमण करता है जब उसमें सामाजिक निवेश बढ़ाते हैं। व्यक्ति को सामाजिक उत्पादक बनाते हैं। प्रेम में सामाजिक निवेश बढ़ाने का अर्थ है प्रेम करने वाले की सामाजिक भूमिकाओं का विस्तार और विकास। समाज से दूर रहकर नहीं उनके बीच रहकर उसे स्थायित्व प्रदान करना प्रेम पैदा करता है, पैदा करने के लिए निवेश जरूरी है, आप निवेश तब ही कर पाएंगे जब पैदा करेंगे। प्रेम में उत्पादन तब ही होता है जब व्यक्ति सामाजिक तौर पर उत्पादन करे। सामाजिक उत्पादन के अभाव में प्रेम बचता नहीं है, प्रेम सूख जाता है। प्रेम के जिस रूप से हम परिचित हैं उसमें समर्पण को हमने महान बनाया है। यह प्रेम की पुंसवादी धारणा है। प्रेम को समर्पण नहीं शिरकत की जरूरत होती है। प्रेम पाने का नहीं देने का नाम है।अगर पुरुष सामाजिक रूप से प्रेम को सशक्त बनाता है तो स्त्री को भी पूर्ण समर्पण भाव से उस सशक्तिकरण को सहेज कर रखना जरुरी है विवाहेत्तर प्रेम की भी मर्यादायें होती है उसे ओपन इंडेड समझ कर न तो उसे निभाया जा सकता है न आगे बढाया जा सकता है। केवल समर्पण और लेने के भाव पर टिका प्रेम इकतरफा होता है। इसमें शोषण का भाव है। यह प्रेम की मालिक और गुलाम वाली अवस्था है। इसमें शोषक-शोषित का संबंध निहित है। दरअसल प्रेम कोई उधाधि या पदवी नहीं केवल एक अनुभूति के बलबूते जीता है और जीवित रहता है उसे अधिकारों की आवश्यकता नहीं न ही किसी पद की वो केवल एक दुसरे के खूबसूरत साथ से भी जीवित रह सकता है बशर्ते आधारभूत आवश्यकतायें पूरी हो, अँधा प्रेम चार दिन का ही होता है, पुरुष सम्मान और सुरक्षा के लिए आधिकारिक रूप से उत्तरदायी न होकर भी दायित्व को समझे और ह्रदय से निभाये।और स्त्री उसके जीवन का स्रजन कर उसे सुकून दे। एक पुरुष को एक स्त्री से केवल सुकून की ही अपेक्षा हो सकती है..... इस प्रेम को समाज में अक्सर स्वीकार नहीं जाता किन्तु कुछ चीजें नियति पर निर्भर करती है जो मनुष्य के समझ से परे सही गलत से उपर होती है शायद इसीलिए आज विवाहेतर प्रेम संबंधो के आंकड़ों में तीव्र गति से इजाफा हुआ किन्तु ये इजाफा केवल प्रेम सम्बन्ध बनने के आंकड़े है चल कितना पाए और खड़े कितने रहे उनकी संख्या इक्की दुक्की ही है। किन्तु कुछ मिसाल भी बनते है जिन पर 'बाजी राव मस्तानी' जैसी फ़िल्में बनती है वो ऐसे ही एक प्रेम का प्रचलित प्रासंगिक उदाहरण है ..मिसाल बनने के लिए तपना होता है ...जीवन भर का साथ सुकून भरा बिना अधिकारों के किसी के साथ जीना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। इसे केवल एक प्रेम करने वाला और अपने प्रेम में अपने आप के साथ संघर्षरत जीवन जीने वाला ही महसूस कर सकता है। सामाजिक द्रष्टि से भले ही उसे दूसरी पत्नी का नाम दिया जाय किन्तु सच तो ये है की वो किसी भी पद का मोहताज नहीं कोई अधिकार उसे निभाने के लिए आवश्यक नहीं वो तो मुक्त जीता है। प्रतीक्षा में की कब मिलेंगे अपनी -अपनी जिम्मेदारियों के चलते अपने लिए जीने एक साथ एक ही छत के नीचे एक ऐसे आत्मविश्वास के साथ जो शायद अब पति -पत्नी के रिश्ते में भी दिखाई नहीं देता। दिखाई देती है तो बस जिम्मेदारी जिसे निभाने के लिए दो युगल एक ही छत के नीचे एक ही कमरे में अपने चन्द्रमा को आधा और पूरा होते देखते है। ठीक इसके विपरीत एक जीवन उस रिश्ते के साथ जो वास्तव में युगल नहीं, ना ही बिताते है रात एक कमरे में, किसी अर्द्ध और पूर्ण चन्द्र के मध्य। वो तो जीते है पूरा जीवन पूर्ण सूरज के उगने और पूर्ण सूरज के ढलने में। आधा कुछ भी नहीं सबकुछ सम्पूर्ण किन्तु समाज की नजर में अपूर्णता का शिकार। वो समाज जिसके पास न तो अपना सूरज है न अपना आधा चंदा सिर्फ वो डूबे है दूसरे की दे ले में। किन्तु ऐसे प्रेम को जीने वाले खुश है क्योकि उन्हें चाहिए सिर्फ साथ एक दुसरे का।मुट्ठी भर समय भी उन्हें इतना कुछ दे जाता है की बहुत पाने की ख्वाहिश नहीं रहती। बिना अधिकारों के अधिकार निभाना बिना बंधन अपने आप को दायरों में बांधना ही इस प्रेम की विजय का परिचायक होता है। दरअसल विवाहेत्तर जीवन में प्रेम होना सामान्य बात हो गई किन्तु सफल परिणामों तक पहुँच पाना दुष्कर ..दरअसल सत्यता के साथ के आभाव में छद्म प्रेम ज्यादा दिनों नहीं चल नहीं पाता अंततः पुरुष को पत्नी और प्रेमिका में से किसी एक का चुनाव करना ही पड़ता है ये एक ऐसा प्रेम जिसे उजागर करने पर भी नहीं चल पाता बस इन दोनों ही परिस्थितियों बीच से सुरक्षित होकर गुजरना ही इसके सफल परिणामों का कारण बन सकता है।और इन परिस्थितियों से सफलतापूर्वक गुजरना आपकी जरूरत पर निर्भर करता है की ये प्रेम आपकी 'जरूरत' है या फिर कुछ समय का आकर्षण या कुछ ख़राब हालातों की उपज ... आपके जीवन में किसी के आने से आपके जीवन के हालात सुधर जाये ये जरुरी नहीं किन्तु आप संभल जाय ये संभव हो सकता है... जो आपको समझ कर संभाल सके वो सशक्त विवेकी और समझदार इंसान आपकी जरूरत बन सकता है जिसके साथ बात करके आप हल्का महसूस करें वही साथी हर इंसान को अपने जीवन में चाहिए होता है और जिसकी उपस्थिति प्रेम के रूप में भी किसी के जीवन में हो सकती है..और प्रेम के रूप में ही हो ये भी जरुरी नहीं यह रिश्ता भाई ,बहन, माँ या फिर किसी मित्र के साथ भी बन सकता है ...क्योकि इसकी महती आवश्यकता परिवार की परिधि होती है और केंद्र में आप इस रिश्ते को रखकर परिधि में अपने परिवार को लेकर चलेंगे तभी इस रिश्ते के उद्दात्त स्वरुप को बचाया जा सकता है ....अन्यथा अपनी जरूरतों के लिए परिवार के सुखों की तिलांजलि देना आपके स्वार्थी होने का परिचायक माना जायेगा ....
--अर्थ जीवन की बुनियादी जरुरत है...‘‘अर्थ सामाजिक प्राणी के जीवन में कितना महत्व रखता है, यह कहने की आवश्यकता नहीं। इसकी उच्श्रृंखला बहुलता में कितने दोष हैं वे अस्वीकार नहीं किए जा सकते, परंतु इसके नितांत अभाव में जो अभिशाप है वे भी उपेक्षणीय नहीं। विवश आर्थिक पराधीनता अज्ञात रुप से व्यक्ति के मानसिक तथा अन्य विकास पर ऐसा प्रभाव डालती रहती है, जो सूक्ष्म होने पर भी व्यापक तथा परिणामतः आत्मविश्वास के लिए विष के समान है।
बुधवार, 29 जून 2016
आलेख
थर्ड जेंडर –सामाजिक अवधारणा एवं पुनरावलोकन
-शोभा जैन
-शोभा जैन
हमारा पूरा समाज दो स्तम्भों पर खड़ा है पुरुष और
स्त्री । लेकिन हमारे समाज में इन दो लिंगों के अलावा भी एक अन्य
प्रजाति का अस्तित्व मौजूद है । समाज में इन्हें
‘थर्ड जेंडर’ और आमतौर सामाजिक रूप से
उपनाम ‘किन्नर’ शब्द से भी संबोधित किया
जाता है । प्रकृति में मौजूद ये प्रजाति नर नारी के अलावा एक अन्य वर्ग में गिनी जाती है
जो न तो पूरी तरह नर होता है और न नारी।
जिसे लोग किन्नर या फिर ट्रांसजेंडर के नाम से संबोधित करते हैं। इसी कारण आम लोगों में उनके जीवन और रहन-सहन को जानने
की जिज्ञासा भी बनी रहती है। स्त्री-पुरुष के साथ ही शास्त्रों में किन्नरों का
वर्णन भी मिलता है। ‘थर्ड जेंडर’ के अंदर एक अलग गुण पाए जाते हैं। इनमे पुरुष और
स्त्री दोनों के गुण एक साथ पाए जाते हैं। संविधान में इन्हें इंटरसेक्स, ट्रांससेक्सुअल और
ट्रांसजेंडर के रूप में पहचाना गया और इनकी पहचान को थर्ड जेंडर में ट्रांसजेंडर
श्रेणी में रखा गया ।
न्यायालय द्वारा किन्नर समाज को तीसरे दर्जे का नागरिक एवं आरक्षण दे कर समाज में
उनके प्रति सद्भावना का संदेश दिया गया है।
दरअसल ये सदैव समाज में चर्चा का
विषय रहें हैं | आज
कल इनकी मानसिक स्थिति और सोच पर कई शोध हुए हैं | आखिर हैं
तो ये भी ईश्वर के बनाये इंसान ही। दरअसल
‘थर्ड जेंडर’ का संदर्भ हमारे मस्तिष्क से है, यदि कोई बच्चा लड़की पैदा होती है और
लड़को की तरह व्यवहार करती है तो यह उसका यौन अभिविन्यास (Sexual
Orientation) कहा जाएगा । थर्ड जेंडर एक तरह से न्यूट्रल है जो अन्य
जेंडर के भीतर नहीं है । इसमें सभी यौनिकताओं का समावेश संभव है । यौनिकता का आशय
यहाँ यौन क्रिया और यौन संबन्धों तक सीमित नहीं है बल्कि यौनिकता से अभिप्राय
प्रवृतियों और व्यवहारों से है ।
इनके पैदा होने पर ज्योतिष शास्त्र का
मानना है कि चंद्रमा, मंगल, सूर्य और लग्न से गर्भधारण होता है। जिसमें वीर्य की अधिकता होने के कारण
लड़का और रक्त की अधिकता होने के कारण लड़की का जन्म होता है। लेकिन जब गर्भधारण
के दौरान रक्त और विर्य दोनों की मात्रा एक समान होती है तो बच्चा ‘किन्नर’ पैदा
होता है । ‘थर्ड जेंडर’ से जुडी बहुत सी एसी मान्यतायें और
बातें रही है जिनकी जानकारी का अभाव अक्सर एक आम इंसान को रहा शायद इसलिए ‘थर्ड
जेंडर’ के जीवन के बेहद प्रेरणास्पद और जानने योग्य पहलुओं से आम समुदाय अक्सर
अछूता ही रहा या यूँ कहे वे केवल चर्चा,परिचर्चा तक ही सिमित रहे उसके निष्कर्ष और
समाज को मिलने वाली सकारात्मक उर्जा को प्रकाश में उस तरह से नहीं लाया गया जिस
तरह से आमतौर पर स्त्री –पुरुषों और एक सामान्य इंसान के जीवन से जुड़े पहलुओं को
लाया जाता है । जबकि पूरी दुनियाँ में स्त्री –पुरुष के प्रकार एक ही
है उनके गुण और विशेषतायें एक ही हैं ये जरुर है की हर कोई अपने स्वभाव में
अलग हो सकता है और उसी वजह से दुनियाँ को उन्हें देखने का द्रष्टिकोण भी अलग –अलग
हो किन्तु मानव अधिकार तो सभी के लिए जो इंसान के रूप में जन्में है एक समान है। जीने के लिए जितनी चीजे
जरुरी है वे हर इन्सान के प्राथमिक अधिकारों का अहम हिस्सा है किन्तु समाज का ये
वर्ग आज भी अपने अधिकारों से वंचित यह समुदाय मानव विभेद का प्रतिक इंसानी
अधिकारों से मरहूम आमतौर पर सामान्य जन के हर शुभ कार्य की रस्मों से जुड़ा है
किन्तु इनका अपना जीवन शुभकामनाओं से दूर क्यों ? यह विषय बहुत अधिक गहन चिन्तन के साथ -साथ इस बात पर
सोचने के लिए भी विवश करता है की समाज का ये वर्ग अपने लिए एक बेहतर जिन्दगी तो
बहुत दूर अपने अधिकारों के लिए भी अपनी लड़ाई लड़ते है ।
जबकि समाज का ये
वर्ग आज से नहीं आदिकाल से बल्कि महाभारत काल से एक प्रेरणा स्त्रोत के रूप में
सामने आया है महाभारत में शिखंडी की कथा प्रसिद्ध है वह एक किन्नर थे उन्हें
अबध्य माना जाता था । पौराणिक आख्यानों में
रामायण, महाभारत और कौटिल्य के अर्थशास्त्र, कामसूत्रम्
उसके बाद मुग़ल इतिहास में बहुत सी घटनाएँ मौजूद हैं । पांडवों को अपने बनवास
का आखिरी वर्ष अज्ञात वास से काटना था सब छुप सकते थे पर धनुर्धर अर्जुन ,पूरे आर्यावर्त में प्रसिद्ध था उसने
ब्रह्नल्ला के नाम को धारण कर किन्नर के रूप में राजा विराट की नृत्य शाला में
राजा की पुत्री उत्तरा को नृत्य सिखा कर सुरक्षा से बिताये |
इसके अतिरिक्त यह भी मान्यता रही हैं की इनकी दुआएं किसी भी व्यक्ति के बुरे समय
को दूर कर सकती है । मुगल काल में किन्नरों की पूरी फौज मुगल हरम की रखवाली
करते थी |
कई किन्नर राजनीति में भी थे सुल्तान अलाउद्दीन का
सलाहकार मलिक काफूर किन्नर था वह सुल्तान का दाया हाथ था | अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद वह किंग मेकर भी
बना | किन्तु आज ये
जानते हुए भी की इंसानी अधिकारों से मरहूम यह समुदाय कई रस्मों और शुभ कार्यों से
जुड़ा है इनके लिए जीना एक अभिशाप बन गया है और मरना भी सुकून से बहुत दूर हैं । एसी मान्यता
रही है की किन्नर की म्रत्यु किसी भी समय
हो किन्तु उनकी शव यात्रा हमेशा रात को ही निकाली जाती थी इतना ही नहीं शव निकालने
से पहले शव को जूते- चप्पलों से पीटा जाता है और पूरा समुदाय एक सप्ताह तक भूखा
रहता है वास्तविकता में अगर इस द्रश्य को देख लिया जाय तो कठोर से कठोर इन्सान भी
रो पड़े किन्तु उनके लिए ये मरने की रस्म भी है और पूरे जीवन पर सवाल उठाता एक कदम
भी आखिर किसी का जीना इतना अभिशप्त कैसे हो सकता है? उनके
साथ सहानुभूति के अभाव में कहीं न
कहीं आज वे आपराधिक मामलों में स्वयं को लिप्त कर रहें है । इसलिए सामाजिक भीड़ में वे अलग- थलग ही
हैं जहाँ वे जाते है लोग उनसे कतराकर निकल जाते है किन्तु शादी ब्याह बच्चे के
जन्मोत्सव पर दुआए देने भर के लिए वे जरुरी होते है । लोगो से जो वो शगुन मांगते है बस वही
उनकी दुआओं की कीमत है। .वे
दुआएं जो हर इंसान के लिए बेहद अनमोल होती है हालाँकि न्यायलय द्वारा बहुत बड़ा और
अहम फैसला लिया गया है इस समुदाय के प्रति की यह पढ़ लिख कर सामान्य जीवन जी सकेंगे। बस आवश्यकता है समाज के
संवेदनशील व्यवहार की और इन्हें भी अपने भीतर अपनी कार्य शैली और सोच में बदलाव को
महसूस कर स्वयं को आमजन के जीवनानुरूप स्थापित करने की । जीवन के किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए
इंसानी अधिकारों का उपयोग सही तरीके से होना आवश्यक है । समाज को
इस समुदाय के प्रति अपना नजरियाँ सहानुभूतिपूर्ण होने के साथ- साथ सहयोगी
और संवेदन शील भी बनाने की आवश्यकता है । साहित्य में भी
‘थर्ड जेंडर’ को विश्लेषित करते हुए बहुत कुछ लिखा गया जिनमें उनकी जैविक संरचना से लेकर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक संरचना के भिन्न-भिन्न पहलुओं को सामने लाने का प्रयास किया गया उपन्यास साहित्य में ‘थर्ड जेंडर’ समुदाय को केन्द्रित करते हुए चार उपन्यास यमदीप,
तीसरी ताली, किन्नर कथा और गुलाम मंडी थर्ड जेंडर पर केन्द्रित प्रचलित उपन्यास रहें है
। और आगे भी अन्तर्द्रष्टि से शोध कर इन
पर लिखने की आवश्यकता है जिससे समाज इनके बारे में अधिक से अधिक जान सके । हालाँकि
थर्ड जेंडर समुदाय धीरे-धीरे समाज की
मुख्यधारा में अपनी जगह बना रहा है किन्तु उन्हें उसके लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही है तरह तरह की
बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है । क़ानूनी रूप से भले ही अधिकार मिल गए हो किन्तु
समाज की मानसिकता से इस वर्ग का संघर्ष अभी जारी है ।
सुप्रीम कोर्ट ने थर्ड जेंडर को सामाजिक और
शैक्षिक रूप से पिछड़ा मानते हुए सरकारी भर्तियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण
देने के निर्देश दिये है । संविधान की धारा १४,१६ और २१ का हवाला देते हुए
थर्ड जेंडर को सामान्य नागरिक अधिकार शिक्षा रोजगार और सामाजिक स्वीकार्यता पर समान
अधिकार देने के निर्देश जारी किये गए है इसी के साथ राज्य सरकार ने तृतीय लिंक
समुदाय को शासन की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए सभी जिलों में जिला
स्तरीय समितियों के गठन के निर्देश जारी किये है । समय के परिवर्तन के साथ क़ानूनी रूप से विकास हो
रहा है किन्तु सामाजिक रूप से इंसानियत से बेहद परे आज भी ये समुदाय अपने अस्तित्व
के लिए संघर्षरत है । समाज ने इंसानियत के जिस तकाजे
पर इस समुदाय को मनुष्यता के सामाजिक पैमाने से बाहर किया । वही मनुष्यता मुख्य धारा से
अधिक इनमें दिखती है । इतिहास और पौराणिक आख्यानों में कहीं भी
इन्हें अनुपयोगी नहीं माना गया है, न ही पुनरउत्पादन की प्रक्रिया में इनकी
निष्क्रियता को इनके मनुष्य होने पर ही चिंहित किया गया है, जैसा कि समाज में होता है । समाज की सोच में शोध चिन्तन की महती आवश्यकता
है क्योकि सामाजिक धारणाओं और पौराणिक
कथाओं से भिन्न साहित्य में इनकी एक अलग छवि गढ़ी गई है । इस छवि की पड़ताल अनेक
संदर्भों के साथ करने की जरुरत है । साथ ही साहित्य की अंतर्दृष्टि ‘थर्ड
जेंडर’ को कैसे देखती है यह समझना व देखना भी आवश्यक होगा । निः संदेह ‘थर्ड
जेंडर’ समुदाय के प्रति सामाजिक द्रष्टिकोण जैसे विषयों पर पुनरावलोकन एवं गहन अध्ययन की आवश्यकता है । बहुत काम करना होगा इस विषय
पर हर संदर्भ में जाकर खोजना समझना होगा ।
केवल
अवलोकन द्रष्टि या उपरी सतह से सिर्फ उनके उपनामों को परिभाषा ही मिल पायेगी।
वास्तविक सम्मान नहीं । किसी भी रूप
में इंसान का होना अपने आप में एक जेंडर है उसे हीन भावना से देखना या फिर उसके
प्रति अपनी संवेदनशीलता को छद्म कर देना मानवता और इंसानियत दोनों के लिए अभिशाप
है । शायद ‘इंसान होने के नाते इन्सान का फर्ज
इंसानियत का सम्मान और सुरक्षा होना चाहिए, न की लिंग भेद जैसी ओछेपन से ग्रसित
मानसिकता से उनका आंकलन विश्लेष्ण कर समाज को प्रदूषित करना’। मनुष्य के
रूप में इन्सान होने के नाते ‘थर्ड जेंडर’ से संबोधित इस समुदाय के प्रति ‘सामाजिक
दुर्व्यवहार’ को पनपने से रोकना इंसानियत
के लिए एक शुभ कार्य की पहल होगी ।
उज्जैन में
आयोजित वर्ष २०१६ का महाकुम्भ इस बात का
प्रत्यक्ष प्रमाण है की ‘थर्ड जेंडर’ के प्रति तुलनात्मक द्रष्टि से समाज में बड़ा
परिवर्तन आया है ये समुदाय धीरे-धीरे समाज की
मुख्यधारा में अपनी जगह बना रहा है। महाकुम्भ में प्रथम बार ‘थर्ड जेंडर’ संप्रदाय का एक अलग स्थान निर्धारित
कर लाखों श्रध्दालुओं ने उनसे आशीर्वाद एवं दुआएं लेकर समाज के इस वर्ग पर
पुनरवलोकन कर अंतर्दृष्टि डालने की पहल कर दी है साथ ही उनसे जुड़े विषयों पर
आधारित सामाजिक अवधारणा पर चिन्तन और शोध करने हेतु विवश भी किया है ।....................................................................................................................
बुधवार, 15 जून 2016
अन्तराष्ट्रीय मासिक पत्रिका 'जनकृति' के जून विशेषांक विषय -'जल' पर आलेख ---लिंक pdfhttp://www.jankritipatrika.com/admin/upload/Shobha%20Jain%20(Article).pdf
कविता --कहाँ गए ....
शोभा जैन
कहाँ गई घरों से तुलसी की क्यारी
वो रस्मों रिवाज, वो तीज वो त्योहारी
दिन भर फटकती वो आंगन की बुहारी,
वो दुपट्टे से ढकी -टुपी कन्या कुंवारी
कहाँ खो गये वो संस्कार
बात करने से पहले करना विचार
कहाँ कहनी है कौन सी बात
किसे देनी है कैसी सौगात
कहाँ गये गुम वो रिश्तों के बुलावे
जो समय-असमय ब्याई समधी घर आवे
कहाँ गुम हुए घर से मुरब्बे और अचार
क्यों बन गए रिश्ते अब व्यापार
कितने बदल गये अपनों के व्यवहार
क्यों नहीं रहा अब लोकाचार
जीवन से गुम हुए मीठे दाल भात
भ्रम,संदेह दुविधाओं का बसा चक्रवात
क्यों रुखी हँसी, ओपचारिकता निभाना
क्यों कठिन है अब मन से मन का मेल खाना
रिश्तों में उलझन है, सुलझती नहीं डौर
मन न तो निश्छल है, मन में बसा है चोर
कैसे सिखाये अब रिश्तों को निभाना
जब जड़ ही भूली है पेड़ को पालना और बढ़ाना
अपनों का साथ खुशकिस्मती से हैं पाना
जीवन में लगा रहता है कठिन समय का आना और जाना।
शोभा जैन
कहाँ गई घरों से तुलसी की क्यारी
वो रस्मों रिवाज, वो तीज वो त्योहारी
दिन भर फटकती वो आंगन की बुहारी,
वो दुपट्टे से ढकी -टुपी कन्या कुंवारी
कहाँ खो गये वो संस्कार
बात करने से पहले करना विचार
कहाँ कहनी है कौन सी बात
किसे देनी है कैसी सौगात
कहाँ गये गुम वो रिश्तों के बुलावे
जो समय-असमय ब्याई समधी घर आवे
कहाँ गुम हुए घर से मुरब्बे और अचार
क्यों बन गए रिश्ते अब व्यापार
कितने बदल गये अपनों के व्यवहार
क्यों नहीं रहा अब लोकाचार
जीवन से गुम हुए मीठे दाल भात
भ्रम,संदेह दुविधाओं का बसा चक्रवात
क्यों रुखी हँसी, ओपचारिकता निभाना
क्यों कठिन है अब मन से मन का मेल खाना
रिश्तों में उलझन है, सुलझती नहीं डौर
मन न तो निश्छल है, मन में बसा है चोर
कैसे सिखाये अब रिश्तों को निभाना
जब जड़ ही भूली है पेड़ को पालना और बढ़ाना
अपनों का साथ खुशकिस्मती से हैं पाना
जीवन में लगा रहता है कठिन समय का आना और जाना।
बुधवार, 1 जून 2016
रविवार, 29 मई 2016
--सच्चा पिता --
शोभा जैन
एक पिता की किसी भी इंसान के जीवन में सबसे अहम भूमिका रहती है ...पिता कहलाने का अधिकार भी उसी को है जिसकी अपनी परेशानियों के चलते, अभावों के चलते,वो इन सब का घड़ा अपने बच्चों के सर पर न फोड़े बल्कि इन्ही विपरीत हालातों में वो बच्चों की परेशानियों उनके दर्द उनकी तकलीफों को समझे ...पिता कहलाने के लिए नहीं निभाने के लिए होता है ....'सच्चा पिता' वही होता है जो अपने बच्चों के सपनों को जमीन पर उतारने की स्वतंत्रता दे ...बच्चे गलती करे और सुधारे , पिता सहारा दे समझाये, संभाले फिर से उठने के लिए... बच्चे आश्वस्त रहे की पिता और माता दोनों साया बनकर हमारे साथ है ...पिता बच्चों की लड़ाई नहीं लड़ेंगे ..ये लड़ाई तो उन्हें स्वयं ही लड़नी है पर सच्चा पिता वो जो इस लड़ाई में अपने बच्चों का पसीना पोछे, उनके घावों पर मरहम लगाये, उन्हें हिम्मत दे ..सबल दे ...बार -बार सीने से लगाये चियर करे , अपने बच्चों को हार नहीं मानने दे.....और कहे जाओं बेटा-- 'अपनी जमीन खुद बनाओं' ....मैं तुम्हारे पीछे खड़ा हूँ आगे तुम्हे बढना है ------''
जिस किसी के पास ऐसे पिता है वो दुनियाँ का सबसे खुशकिस्मत इंसान है ....
शोभा जैन
एक पिता की किसी भी इंसान के जीवन में सबसे अहम भूमिका रहती है ...पिता कहलाने का अधिकार भी उसी को है जिसकी अपनी परेशानियों के चलते, अभावों के चलते,वो इन सब का घड़ा अपने बच्चों के सर पर न फोड़े बल्कि इन्ही विपरीत हालातों में वो बच्चों की परेशानियों उनके दर्द उनकी तकलीफों को समझे ...पिता कहलाने के लिए नहीं निभाने के लिए होता है ....'सच्चा पिता' वही होता है जो अपने बच्चों के सपनों को जमीन पर उतारने की स्वतंत्रता दे ...बच्चे गलती करे और सुधारे , पिता सहारा दे समझाये, संभाले फिर से उठने के लिए... बच्चे आश्वस्त रहे की पिता और माता दोनों साया बनकर हमारे साथ है ...पिता बच्चों की लड़ाई नहीं लड़ेंगे ..ये लड़ाई तो उन्हें स्वयं ही लड़नी है पर सच्चा पिता वो जो इस लड़ाई में अपने बच्चों का पसीना पोछे, उनके घावों पर मरहम लगाये, उन्हें हिम्मत दे ..सबल दे ...बार -बार सीने से लगाये चियर करे , अपने बच्चों को हार नहीं मानने दे.....और कहे जाओं बेटा-- 'अपनी जमीन खुद बनाओं' ....मैं तुम्हारे पीछे खड़ा हूँ आगे तुम्हे बढना है ------''
जिस किसी के पास ऐसे पिता है वो दुनियाँ का सबसे खुशकिस्मत इंसान है ....
मंगलवार, 24 मई 2016
आलेख
–‘जल’ ‘संरक्षण’ ही अंतिम विकल्प
शोभा जैन
शोभा जैन
धरती पर मौजूद सभी पदार्थों
में ‘’जल’’ सबसे साधारण, सबसे महान् और सबसे आश्चर्यजनक है। शोधकर्ताओं
द्वारा तो इस तथ्य की भी खोज की जा रही है स्रष्टि में जीवन की उत्पत्ति, उद्भ्व
और विकास में ‘’जल’’ की विशिष्टताओं की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। फिर भी
अधिकतर लोग इसके बारे में बहुत कम जानते है या यूँ कहें जब –जब ‘’जल’’ संकट से
गुजरते है इसके बारे में जानने की जिज्ञासा प्रबल होती है । आमतौर पर वैज्ञानिक
द्रष्टि से ‘’जल’’ या पानी एक आम रासायनिक पदार्थ है, जिसका अणु दो हाइड्रोजन परमाणु और एक ऑक्सीजन परमाणु से बना है - H2O,
किन्तु धरती
पर पाये जाने वाले समस्त पदार्थों में ‘जल’ प्रकृति का सबसे बहुमूल्य विशिष्ट और
आसाधारण गुणों से युक्त एक एसी अनिवार्य आवश्यकता है जिसके बिना जीवन संभव नहीं। अतः यह स्पष्ट है –- ‘धरती पर जीवन के अस्तित्व के
लिये ‘जल’ अनिवार्य आवश्यकता है।’ धरती पर चारों तरफ़ (धरती का लगभग तीन-चौथाई
भाग) पानी से घिरे हुए है, इसके बावजूद हम
लोग भारत और दुनिया के दूसरे देशों में पानी की समस्या से जूझ रहें है, ये हमारा
दुर्भाग्य है, किन्तु इसके पीछे के वैज्ञानिक कारण इस दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति से
कहीं उपर है। क्योंकि महासागर में लगभग
पूरे जल का 97% नमकीन पानी है, जो इंसानों के
उपयोग के लिये सही नहीं है। धरती पर मौजूद पूरे जल का केवल 3% ही उपयोग लायक है (जिसका कि 70% बर्फ की परत और
ग्लेशियर के रुप में है और 1% जल ही पीने लायक पानी के रुप
में। दरअसल
‘जल’ विश्व अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।यह रासायनिक
पदार्थों की एक विस्तृत श्रृंखला के लिए विलायक के रूप में कार्य करता है। विश्व में स्वच्छ पानी की पर्याप्तता
लगातार गिर रही है दुनिया के कई हिस्सों में पानी की मांग पहले से ही आपूर्ति से
अधिक है और जैसे-जैसे विश्व में जनसंख्या में अभूतपूर्व दर से वृद्धि हो रही है, तीव्र
शहरीकरण, ओद्योगिकरण से निकट भविष्य में इस असंतुलन का अनुभव बढ़ने की निराशा ही
दिखाई दे रही है, जबकि ‘पोषण’ और ‘जल’ ये दोनों ही मनुष्य और जीव की बुनियादी आवश्यकतायें है ‘जल’ ‘जीवन का आधार
है ।‘यह एक तरह से प्रकृति प्रदत्त एक विलक्षण योगिक है।
किन्तु स्वच्छ ‘’जल’’ का अभाव एक बड़ी
समस्या बनता जा रहा है। ये ऐसी समस्या है जिसको वैश्विक स्तर पर लोगों के मिलकर
प्रयास करने की जरुरत है। दुनिया के कई भागों में खासकर
विकासशील देशों मे भयंकर जलसंकट है और अनुमान है कि 2025 तक विश्व
की आधी जनसंख्या इस जलसंकट से दो-चार होगी। अक्सर पाया जाता है आम लोगों को पीने
और खाना बनाने के साथ ही रोजमर्रा के कार्यों को पूरा करने के लिये जरूरी पानी के
लिये लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। जबकि दूसरी ओर, पर्याप्त
जल के क्षेत्रों में अपने दैनिक जरुरतों से ज्यादा पानी लोग बर्बाद कर रहें
हैं।जीवन के सभी कार्यों को निष्पादित करने के लिये जल की आवश्यकता है क्योकि न तो
पानी पीने पर नियंत्रण किया जा सकता है न ही भोजन बनाने, नहाने,
कपड़ा धोने, फसल पैदा करने आदि में किन्तु इसे
प्रदूषित होने से बचाकर इसकी आपूर्ति को पूरा करने का प्रयास किया जा सकता है इसके
लिए उचित प्रदूषण प्रबंधन होना चाहिये । ‘’जल’’ ‘जीवन’ की गुणवत्ता को
आश्वस्त करने के लिये मुख्य घटक और एक सार्वभौमिक
द्रावक है। धरती
पर स्वच्छ ‘’जल’’ के महत्व को समझना चाहिये अन्यथा निकट भविष्य में लोग अपनी मूल
जरुरतों को भी पूरा नहीं कर पाएंगे। कुछ महत्वपूर्ण
अध्ययन तथ्य बताते है कि ऐसा पाया गया कि लगभग 25% शहरी
जनसंख्या की साफ पानी तक पहुंच है ही नहीं है।इसलिए स्वच्छ पानी की कमी से निपटने
के लिये एक-साथ आने की जरुरत है। अपने प्रतिदिन की गतिविधियों में कुछ सकारात्मक
बदलाव करने की जरुरत है। अब हम देख सकते हैं कि---- सभी जगह शुद्ध
पानी बॉटल में बिक रहा है। पहले लोग पानी को दुकानों में बिकता
देख आश्चर्यचकित हो गये थे पानी जैसी चीज के लिए भी पैसे देनी होंगे जबकि छोटे
गाँव में आज भी मांगने पर अनजान राहगीरों को घर से लौटे में ससम्मान ‘जल’ दिया
जाता है उसके कोई पैसे या कीमत नहीं चुकाई जाती किन्तु शहरों में स्थिति ठीक इसके
विपरीत है। जबकि गाँव में महिलाएं अधिक
मशक्कत से दूर-दूर से अपने सिर पर तीन चार
घड़े एक साथ रखकर पानी लाती है फिर भी वहां ‘’जल’’ मुफ्त में मिलता है। किन्तु शहरों में पानी की कीमत देनी होती है ये मानवता के लिए दुखद विषय है। हालांकि अब
शहरों में तो लोग, अपने अच्छे स्वास्थ्य के लिये 20 रुपये प्रति बॉटल से भी अधिक देने
के लिये तैयार हैं जबकि ‘’जल’’ प्रकृति प्रदत्त उपहार है फिर इंसानों द्वारा उसकी
कीमत लगाई और चुकाई जा रही है। सच तो ये
है की जिसका निर्माण इन्सान ने नहीं किया उसकी कीमत मांगने का अधिकार इंसान को
नहीं किन्तु इस बात को समझने के लिए प्रक्रति से जुड़ाव होना अधिक आवश्यक है । भारत
के जिम्मेदार नागरिक होने के नाते, पानी की कमी के सभी
समस्याओं के बारे में हमें अपने आपको जागरुक रखने की गंभीरता से आवश्यकता है। विश्व में शायद ही कोई
वस्तु ऐसी होगी जो पानी से भी ज्यादा आम हो। ‘’जल’’ एक बेहद उत्कृष्ट विलायक है । ठोस, द्रव, और गैस तीनों रूप
में पायी जाने वाली इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को समझे। पानी को बचाना अपना ‘धर्म’
समझें, पानी के अपव्यय को रोकें । लाखों लोगों का एक छोटा सा प्रयास ‘जल’ संरक्षण
अभियान की ओर एक बड़ा सकारात्मक परिणाम दे सकता है जो जीवन के लिए वरदान साबित
होगा । हम स्वयं पानी का निर्माण नहीं कर सकते, और जिसका निर्माण नहीं किया जा
सकता, वह स्वनिर्मित होता है उसे सहेजना ही अंतिम विकल्प है ‘’जल’’ ‘स्वनिर्मित प्राकृतिक सम्पदा है।’ इसे
सहेजे और प्राकृतिक दोहन के बचाव में अपनी अहम भूमिका निभायें।
……………………………………………………………………………………
रविवार, 15 मई 2016
सदस्यता लें
संदेश (Atom)

